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सियासत में हैट्रिक की तैयारी, खर्च में फिसड्डी माननीय ! विधायक निधि खर्च में CM से लेकर मंत्री तक पीछे

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राजू अनेजा,काशीपुर। चुनावी मैदान की आहट के बीच जहां माननीय हैट्रिक की रणनीति बुनने में जुटे हैं, वहीं विकास कार्यों की असल तस्वीर कुछ और ही कहानी कह रही है। करोड़ों रुपये की विधायक निधि अब भी फाइलों में अटकी पड़ी है। हालात यह हैं कि प्रदेश में औसतन सिर्फ 69 प्रतिशत निधि ही खर्च हो सकी है, जबकि 31 प्रतिशत राशि अब भी उपयोग का इंतजार कर रही है।
यह खुलासा काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन (एडवोकेट) द्वारा मांगी गई सूचना से हुआ है, जिसे ग्राम्य विकास आयुक्त कार्यालय ने उपलब्ध कराया।

 

दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2022-23 से दिसंबर 2025 तक विधायकों को कुल 1,31,400 लाख रुपये की निधि मिली, लेकिन इसमें से केवल 91,124.29 लाख रुपये ही खर्च हो पाए, जबकि 40,261.71 लाख रुपये अब भी शेष हैं।

CM भी औसत से पीछे, कई मंत्री भी सुस्त

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (चंपावत) भी खर्च के मामले में प्रदेश के औसत से पीछे हैं। दिसंबर 2025 तक उन्होंने केवल 47 प्रतिशत निधि ही खर्च की है।

अन्य मंत्रियों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं


सतपाल महाराज – 63%
गणेश जोशी – 79%
डॉ. धन सिंह रावत – 42%
सुबोध उनियाल – 54%
रेखा आर्य – 62%
सौरभ बहुगुणा – 89%

नए मंत्रियों का मिला-जुला प्रदर्शन

मार्च 2026 में मंत्री बने विधायकों में भी तस्वीर अलग नहीं—
खजानदास – 82%
भरत सिंह चौधरी – 55%
मदन कौशिक – 64%
प्रदीप बत्रा – 88%
राम सिंह कैड़ा – 69%

टॉप बनाम फ्लॉप—खर्च में बड़ा अंतर

 

जहां कुछ विधायक निधि खर्च में आगे नजर आए—
फुरकान अहमद, रवि बहादुर – 92%
सरवत करीम, सौरभ बहुगुणा, गोपाल सिंह – 89%
प्रदीप बत्रा, राजकुमार – 88%
वहीं दूसरी ओर कई विधायक बेहद पीछे—
किशोर उपाध्याय – 30%
प्रमोद अग्रवाल – 41%
डॉ. धन सिंह रावत – 42%
पुष्कर सिंह धामी समेत कई विधायक – 47%
सुरेश गणिया – 49%

औसत से नीचे लंबी सूची

प्रदेश के औसत 69% से कम खर्च करने वालों में प्रीतम सिंह, सुबोध उनियाल, सतपाल महाराज, मदन कौशिक, रेखा आर्य, त्रिलोक सिंह चीमा समेत कई नाम शामिल हैं, जो विकास कार्यों की धीमी रफ्तार की ओर इशारा करते हैं।

🔍 बड़ा सवाल—विकास क्यों अटका?

जब कार्यकाल का अंतिम साल करीब है, तब भी निधि का बड़ा हिस्सा खर्च न होना कई सवाल खड़े करता है—
क्या योजनाएं जमीन पर नहीं उतर रहीं?
क्या प्रशासनिक प्रक्रिया में ढिलाई है?
या फिर सियासत में व्यस्तता ने विकास को पीछे छोड़ दिया?

एक ओर हैट्रिक की तैयारी और चुनावी रणनीति, दूसरी ओर विकास कार्यों की सुस्ती

 

—ऐसे में जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है कि जब पैसा मौजूद है, तो काम क्यों नहीं दिख रहा?
अब देखना यह होगा कि बचे हुए समय में माननीय इस “अटकी हुई निधि” को जमीन पर उतार पाते हैं या नहीं।

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