उत्तराखंड : प्राइमरी स्कूलों में भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित ‘पंचकोष विकास सिद्धांत’ को लागू करने की अनुशंसा
उत्तराखंड में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत स्कूली शिक्षा की नींव को मजबूत करने के लिए एक क्रांतिकारी बदलाव किया गया है। एससीईआरटी (SCERT) ने अब कक्षा 5वीं तक के बच्चों के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित ‘पंचकोष विकास सिद्धांत’ को लागू करने की अनुशंसा की है।
इसका मुख्य उद्देश्य 3 से 8 वर्ष के बच्चों को केवल किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि उनका सर्वांगीण (Holistic) विकास करना है।
🕉️ क्या है पंचकोष विकास सिद्धांत?
इस सिद्धांत के अनुसार, एक बच्चे का व्यक्तित्व पांच स्तरों या ‘कोषों’ से मिलकर बना होता है। नई पाठ्यचर्या में इन पांचों पर अलग-अलग गतिविधियों के जरिए ध्यान दिया जाएगा:
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अन्नमय कोष (शारीरिक): स्वस्थ शरीर के लिए पोषण और व्यायाम पर ध्यान।
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प्राणमय कोष (जीवन शक्ति): स्वच्छता, प्राणायाम और ऊर्जा का सही संतुलन।
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मनोमय कोष (भावनात्मक): आत्मविश्वास, सामाजिक कौशल और मानसिक संतुलन विकसित करना।
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विज्ञानमय कोष (बौद्धिक): रटने के बजाय तर्क (Logic), जिज्ञासा और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देना।
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आनंदमय कोष (नैतिक): आत्मिक खुशी, नैतिक मूल्य और राष्ट्रप्रेम की भावना जागृत करना।
🏫 उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था में क्या बदलेगा?
राज्य के 11,580 प्राथमिक विद्यालयों के 3 लाख से अधिक बच्चों के लिए अब शिक्षा का स्वरूप कुछ ऐसा होगा:
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स्थानीय स्पर्श: पाठ्यक्रम में उत्तराखंड की लोक संस्कृति, गढ़वाली-कुमाऊंनी कहानियों और भौगोलिक परिवेश को शामिल किया गया है।
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खेल-खेल में शिक्षा: रटंत पद्धति को खत्म कर ‘अनुभवात्मक शिक्षा’ (Experiential Learning) और खेल-आधारित गतिविधियों पर जोर दिया जाएगा।
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दबाव मुक्त वातावरण: शिक्षकों को इस तरह प्रशिक्षित किया जाएगा कि बच्चों पर बस्ते का बोझ कम हो और सीखने की प्रक्रिया सहज बने।
🗣️ नेतृत्व की राय
“नई व्यवस्था से बच्चों पर शैक्षणिक दबाव कम होगा। शिक्षकों के प्रशिक्षण और मूल्यांकन पद्धति में भी जल्द ही इसी के अनुरूप बदलाव किए जाएंगे।”
— रविदर्शन तोपाल, राज्य समन्वयक, एससीईआरटी।
“इन अनुशंसाओं को धरातल पर उतारने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी फील्ड अधिकारियों की है। उन्हें अभिभावकों और जनसमुदाय से संवाद कर एक सशक्त वातावरण बनाना होगा।”
— बंदना गर्ब्याल, निदेशक एससीईआरटी।
💡 मुख्य लाभ
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बच्चों की कल्पनाशक्ति और रचनात्मकता को उड़ान मिलेगी।
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शिक्षा बच्चों के दैनिक जीवन से जुड़ी होगी, जिससे वे स्कूल आने में रुचि लेंगे।
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नैतिक मूल्यों के विकास से समाज को बेहतर नागरिक मिलेंगे।

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