काशीपुर में सरप्लस जमीन की रजिस्ट्री से खुली सिस्टम की पोल, हाई कोर्ट ने डीएम को चार हफ्ते में जांच कर रिपोर्ट देने के दिए आदेश

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राजू अनेजा ,काशीपुर / नैनीताल। काशीपुर में सरप्लस घोषित जमीन को कथित तौर पर धोखे से बेचने के मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने सुनवाई के दौरान इसे गंभीर प्रशासनिक चूक मानते हुए जिलाधिकारी ऊधमसिंह नगर को पूरे मामले की विस्तृत जांच कराने के निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह पता लगाया जाना जरूरी है कि आखिर किन अधिकारियों की लापरवाही के कारण प्रतिबंधित भूमि की बिक्री संभव हो सकी।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने कड़ा सवाल उठाया कि जब भूमि को पहले ही सरप्लस घोषित किया जा चुका था तो राजस्व अभिलेखों में इसका स्पष्ट अंकन क्यों नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि यदि राजस्व रिकॉर्ड समय पर अपडेट किया गया होता तो इस तरह की स्थिति पैदा ही नहीं होती।
याचिकाकर्ता लक्ष्मी देवी की ओर से अदालत में बताया गया कि बीना और जसवंत सिंह ने काशीपुर स्थित खसरा नंबर 13 मीन की 0.418 हेक्टेयर भूमि का विक्रय विलेख उनके पक्ष में निष्पादित किया था। बाद में जानकारी मिली कि यह भूमि पहले ही उत्तर प्रदेश अधिरोपण एवं भूमि जोत सीमा (संशोधन) अधिनियम, 1972 के तहत सरप्लस घोषित की जा चुकी थी और इसकी बिक्री कानूनी रूप से संभव ही नहीं थी।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी अदालत के सामने रखा गया कि उप जिलाधिकारी काशीपुर की ओर से आरोपी बीना को नोटिस जारी कर पहले ही स्पष्ट कर दिया गया था कि वह इस भूमि पर अवैध रूप से काबिज है। इसके बावजूद आरोप है कि तथ्यों को छिपाकर जमीन का विक्रय कर दिया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने आरोपितों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश दिए थे। सुनवाई के दौरान बीना ने मामले की जानकारी से इनकार किया, जबकि जसविंदर सिंह ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता लक्ष्मी देवी को छह लाख रुपये का चेक अदालत में ही सौंप दिया।
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकारी तंत्र की विफलता के बिना इस तरह की धोखाधड़ी संभव नहीं है। न्यायालय ने कहा कि उन अधिकारियों की पहचान की जानी चाहिए जिन्होंने अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन नहीं किया और राजस्व रिकॉर्ड को अपडेट नहीं होने दिया।
हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी ऊधमसिंह नगर को निर्देश दिए हैं कि वह पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर चार सप्ताह के भीतर अपनी अनुपालन रिपोर्ट अदालत में पेश करें। साथ ही अन्य प्रतिवादियों को भी अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का आदेश दिया गया है।
मामले की अगली सुनवाई 16 अप्रैल को तय की गई है। अदालत के सख्त रुख के बाद प्रशासनिक महकमे में भी हलचल तेज हो गई है और अब सभी की नजर जांच रिपोर्ट पर टिकी हुई है।

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क्या होती है सरप्लस जमीन

सरकार ने भूमि जोत सीमा कानून के तहत एक व्यक्ति या परिवार के पास जमीन रखने की अधिकतम सीमा तय की है। यदि किसी के पास इस सीमा से अधिक भूमि पाई जाती है तो अतिरिक्त भूमि को सरप्लस घोषित कर दिया जाता है। ऐसी जमीन पर सरकार का अधिकार हो जाता है और इसे बेचना या खरीदना कानूनी रूप से मान्य नहीं होता।

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