
राजू अनेजा,काशीपुर। तराई की हरियाली और उपजाऊ जमीन के लिए पहचाने जाने वाला काशीपुर आज तेजी से अपनी पहचान खोता नजर आ रहा है। कभी “मिनी पंजाब” के नाम से मशहूर यह इलाका अब कंक्रीट के जंगल में तब्दील होता जा रहा है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि तराई पश्चिमी वन प्रभाग के काशीपुर रेंज में जहां पहले करीब 20 फीसदी वन क्षेत्र था, वह अब सिमटकर महज 1 फीसदी रह गया है। वहीं तहसील क्षेत्र की 30 प्रतिशत से अधिक भूमि पर कंक्रीट का कब्जा हो चुका है।
खेतों से कॉलोनियों तक… बदल गई तस्वीर
काशीपुर की तराई कभी अपनी भरपूर पैदावार के कारण “मिनी पंजाब” कहलाती थी। यहां की उपजाऊ जमीन और हरियाली इस क्षेत्र की पहचान थी। लेकिन राज्य गठन के बाद तस्वीर तेजी से बदली।
प्रॉपर्टी डीलरों का एक बड़ा नेटवर्क खड़ा हुआ, जिसने गांवों की सस्ती कृषि भूमि को निशाना बनाया। नियमों को दरकिनार कर बड़े पैमाने पर प्लॉटिंग शुरू हुई और खेतों की जगह बेतरतीब कॉलोनियां बसती चली गईं।
बिना योजना का फैलता ‘कंक्रीट मॉडल’
इन कॉलोनियों की हकीकत चौंकाने वाली है संकरी गलियां और अव्यवस्थित रास्ते
सीवर और जल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं ।
पार्क, मंदिर या सार्वजनिक स्थानों का अभाव
प्रॉपर्टी डीलर केवल भूखंड बेचकर किनारा कर लेते हैं, जबकि निर्माण की जिम्मेदारी खरीदार पर छोड़ दी जाती है। नतीजा—बिना नक्शे और मानकों के बसी कॉलोनियां, जो आने वाले समय में बड़ी शहरी समस्याओं को जन्म दे सकती हैं।
प्रमुख मार्गों के किनारे 60% जमीन बिक चुकी
काशीपुर के प्रमुख मार्ग—काशीपुर-कुंडेश्वरी, काशीपुर-जसपुर, काशीपुर-रामनगर, काशीपुर-अलीगंज और काशीपुर-दढ़ियाल—इन सभी के किनारे करीब 60 प्रतिशत भूमि प्लॉटिंग के लिए बिक चुकी है।
नियमों के मुताबिक, नदी के किनारे 200 मीटर तक निर्माण प्रतिबंधित है, लेकिन ढेला नदी के किनारे तक कॉलोनियां काट दी गईं और मकान भी खड़े हो गए। यह स्थिति न केवल नियमों की अनदेखी है, बल्कि भविष्य में बाढ़ और जलभराव के खतरे को भी बढ़ा रही है।
जहां जंगल थे, वहां अब बस्तियां
काशीपुर रेंज के गोविंदपुर, चांदपुर, मानपुर, कचनालगाजी, गढ़ी इंद्रजीत, प्रतापपुर, जसपुर खुर्द, नीझड़ा, ढकिया गुलाबो, सरवरखेड़ा, बैलजुड़ी, कुंडेश्वरी, शंकरपुरी, कुआंखेड़ा, मालवा फार्म और हिम्मतपुर जैसे क्षेत्रों में कभी घना जंगल फैला हुआ था।
वन विभाग के पूर्व अधिकारियों के अनुसार, पिछले 20-25 वर्षों में इन इलाकों में तेजी से जंगल कटे और उनकी जगह कॉलोनियां बस गईं। आज स्थिति यह है कि कई स्थानों पर जंगल का नामोनिशान तक नहीं बचा है।
सिर्फ 10 हेक्टेयर में सिमटी हरियाली
अब पूरे काशीपुर रेंज में गोविंदपुर क्षेत्र में ही करीब 10 हेक्टेयर जंगल बचा हुआ है। यही क्षेत्र अब हरियाली की अंतिम उम्मीद बन गया है।
वन क्षेत्राधिकारी देवेंद्र सिंह रजवार के अनुसार, इस छोटे से जंगल की सुरक्षा के लिए लगातार गश्त की जाती है, ताकि तस्करों और शिकारियों से इसे बचाया जा सके।
जंगल घटे तो अब वन्यजीव भी आबादी में ढूंढ रहे आशीयाना
जंगलों के खत्म होने का असर अब गांवों में साफ दिखाई दे रहा है। चांदपुर, मानपुर और फिरोजपुर जैसे इलाकों में जंगली जानवरों की आवाजाही बढ़ गई है।
वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास खत्म होने के कारण वे अब भोजन और आश्रय की तलाश में आबादी की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा बढ़ रहा है।
बढ़ता पर्यावरणीय संकट
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के अनियंत्रित शहरीकरण से—
तापमान में लगातार वृद्धि होगी
भूजल स्तर तेजी से गिरेगा
बाढ़ और जलभराव की समस्या बढ़ेगी
जैव विविधता को भारी नुकसान होगा
अब कार्रवाई का वक्त
पृथ्वी दिवस (Earth Day) के मौके पर काशीपुर की यह स्थिति एक बड़ी चेतावनी है। अगर समय रहते अवैध प्लॉटिंग और अंधाधुंध निर्माण पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले वर्षों में काशीपुर की पहचान पूरी तरह बदल जाएगी।
अब सवाल यही है—क्या प्रशासन और वन विभाग मिलकर इस कंक्रीट के फैलते साम्राज्य पर लगाम लगा पाएंगे, या फिर हरियाली यूं ही भू-कारोबारियों की भेंट चढ़ती रहेगी?
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