राजू अनेजा, काशीपुर।श्रद्धा जब व्यवस्था से मिलती है, तब रास्ते सिर्फ दिखाई ही नहीं देते, बल्कि सुरक्षित भी हो जाते हैं। काशीपुर के इतिहास में इस वर्ष पहली बार ऐसा होगा, जब शिवरात्रि के पावन अवसर पर नगर में प्रवेश करने वाले हजारों शिवभक्त कांवड़ियों को बैलजूड़ी और ढेला पुल क्षेत्र में अंधकार का सामना नहीं करना पड़ेगा।
महापौर दीपक बाली ने कांवड़ यात्रा के दौरान वर्षों से चली आ रही इस पीड़ा को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ समझा और उसे स्थायी समाधान प्रदान किया। नगर निगम के माध्यम से लगभग दो लाख रुपये की लागत से पूरे मार्ग पर 21 बिजली के खंभों पर हाई-मास्ट लाइटें स्थापित की गई हैं, जिससे अब यह पथ रात्रि में भी उजास से भर गया है।
यह वही मार्ग है, जहां से हर वर्ष उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के दूर-दराज़ क्षेत्रों से आए शिवभक्त नंगे पांव, कांधे पर कांवड़ रखकर अपने आराध्य की ओर बढ़ते हैं। पूर्व में यहां प्रकाश की व्यवस्था न होने से आम नागरिकों के साथ-साथ कांवड़ियों को भी कठिनाइयों और दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता था। वर्षों से उठती रही मांगें अनसुनी रहीं, किंतु इस बार संवेदना ने संकल्प का रूप लिया।
गत वर्ष महापौर बनने के बाद जब यह विषय उनके संज्ञान में आया, तो समय की कमी आड़े नहीं आई। उन्होंने सरकारी प्रक्रियाओं की प्रतीक्षा किए बिना अपने निजी खर्च से जनरेटर द्वारा ढेला पुल पर प्रकाश की व्यवस्था करवाई, जिससे श्रद्धालुओं को बड़ी राहत मिली और यात्रा निर्विघ्न संपन्न हुई।
इस वर्ष वही व्यवस्था और अधिक सुदृढ़ होकर स्थायी स्वरूप में सामने आई है। दीपक बाली स्वयं मौके पर उपस्थित रहकर प्रकाश व्यवस्था का निरीक्षण करते नजर आए—यह सुनिश्चित करते हुए कि हर दीप जले और हर कदम सुरक्षित रहे।
महापौर ने कहा कि नंगे पांव चलने वाले शिवभक्तों की पीड़ा को समझते हुए मार्ग की विशेष सफाई कराई जा रही है, ताकि किसी को भी कष्ट न हो। नगर क्षेत्र में स्वच्छता व्यवस्था को भी सुदृढ़ किया गया है और जहां-जहां सेवा के रूप में भंडारे लगाए जाते हैं, वहां नियमित सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि महापौर दीपक बाली वर्षों से जसपुर रोड से बैलजूड़ी की ओर तिकोणिया क्षेत्र में लगने वाले भंडारों में निरंतर सहयोग करते आ रहे हैं। वे स्वयं उपस्थित होकर शिवभक्तों की सेवा करते हैं। इस सेवा कार्य में संजीवनी हॉस्पिटल परिवार का सहयोग भी निरंतर रहता है।
यह रोशनी केवल खंभों पर लगी लाइटों की नहीं, बल्कि उस सोच की है—जो आस्था का सम्मान करती है, सेवा को अपना धर्म मानती है और व्यवस्था को मानवीय संवेदना से जोड़ती है।
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