
वैज्ञानिक जांच के बिना नहीं लगेगा नशे में वाहन चलाने का आरोप, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने धारा-105 का आरोप किया खारिज
शराब की गंध नहीं, सबूत चाहिए… हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
राजू अनेजा,नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि किसी चालक के मुंह से शराब की गंध आने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि वह नशे की हालत में वाहन चला रहा था। कोर्ट ने कहा कि जब तक रक्त जांच या ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट से यह साबित न हो जाए कि चालक के शरीर में शराब की मात्रा मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की तय सीमा से अधिक थी, तब तक केवल गंध के आधार पर नशे में ड्राइविंग का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
धारा-105 का आरोप हटाया, अन्य आरोप बरकरार
न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने अमर सिंह की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए सत्र न्यायालय द्वारा भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा-105 के तहत तय आरोप को रद्द कर दिया। हालांकि, धारा 125(क), 125(ख) और 281 के तहत तय आरोप यथावत रखे गए।
जीप हादसे के बाद उठा था विवाद
मामला बदरीनाथ धाम से चमोली जा रही एक जीप के हादसे से जुड़ा है। वाहन अनियंत्रित होकर पलट गया था, जिसमें कई यात्री घायल हुए और एक यात्री की मौत हो गई। मेडिकल जांच में डॉक्टरों ने चालक के मुंह से शराब की गंध आने का उल्लेख किया, लेकिन न तो उसका रक्त परीक्षण कराया गया और न ही ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट किया गया।
कोर्ट ने कहा- गंध नहीं, वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी
याचिकाकर्ता ने अदालत में दलील दी कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा-185 के अनुसार नशे में वाहन चलाने का आरोप तभी बनता है, जब वैज्ञानिक जांच से यह सिद्ध हो कि चालक के 100 मिलीलीटर रक्त में 30 मिलीग्राम से अधिक अल्कोहल मौजूद थी। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि वैज्ञानिक जांच के अभाव में केवल शराब की गंध के आधार पर धारा-105 के तहत आरोप तय नहीं किया जा सकता।
हादसे की वजह टायर फटना बताई
चालक की ओर से यह भी कहा गया कि दुर्घटना उसकी लापरवाही से नहीं, बल्कि वाहन का अगला बायां टायर फट जाने के कारण हुई थी। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य प्रथम दृष्टया धारा-105 के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
“अब सिर्फ शराब की गंध नहीं, वैज्ञानिक सबूत ही तय करेंगे कि चालक नशे में था या नहीं।”
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