वाह री व्यवस्था! डेढ़ दशक बाद डॉक्टर मिली, पर गरीबों का हक छिन गया

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राजू अनेजा, काशीपुर। प्रदेश भले ही चुनाव की दहलीज पर खड़ा हो और चार वर्षों के विकास के बड़े-बड़े दावे गूंज रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति आज भी ऐसी है कि गंभीर बीमारियों में मरीजों को देहरादून और दिल्ली जैसे बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है।
जी हां, बात हो रही है काशीपुर के प्रमुख सरकारी अस्पताल एलडी भट्ट राजकीय उप जिला चिकित्सालय की, जहां सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों एक अजीब विडंबना के दौर से गुजर रही है।
15 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद अस्पताल को महिला फिजिशियन की तैनाती तो मिल गई, लेकिन इसी के साथ गरीब मरीजों के मुफ्त इलाज का रास्ता बंद हो गया। सवाल उठ रहा है—क्या यही है सरकार की स्वास्थ्य प्राथमिकता?

डेढ़ दशक बाद भरा गया रिक्त पद

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अस्पताल में फिजिशियन का पद पूर्व सीएमएस एवं महिला फिजिशियन स्व. डॉ. गीता रावत के निधन के बाद से खाली पड़ा था। इतने वर्षों तक मरीजों को बुखार, शुगर, ब्लड प्रेशर और अन्य जटिल बीमारियों के इलाज के लिए निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ी। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर इसका सीधा असर पड़ा।
हाल ही में शासन स्तर से महिला फिजिशियन डॉ. कीर्ति मेहता की तैनाती की गई। उन्होंने कार्यभार संभालते ही ओपीडी में मरीजों को देखना शुरू कर दिया। पहले ही दिन करीब 30 मरीजों को परामर्श दिया गया। अस्पताल प्रशासन ने इसे बड़ी उपलब्धि बताया।

 

लेकिन उसी वक्त आयुष्मान सेवा ठप

जहां एक ओर डॉक्टर की तैनाती से राहत की उम्मीद जगी, वहीं दूसरी ओर आयुष्मान कार्ड बनाने वाली अनुबंधित कंपनी ने अस्पताल से अपनी सेवाएं समेट लीं। कारण बताया गया—पर्याप्त केस नहीं मिलना।
कोरोनाकाल के बाद शुरू की गई आयुष्मान सेवा पहले भी बीच में बंद हो चुकी थी। नवंबर में दोबारा शुरू हुई व्यवस्था अब फिर ठप है। शुरुआत में प्रतिदिन तीन-चार कार्ड बन रहे थे, लेकिन बाद में संख्या घटकर महीने में 10-15 केस तक सिमट गई। आखिरकार कंपनी ने आयुष्मान मित्र हटा लिया।

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गरीबों के लिए बड़ा झटका

आयुष्मान योजना के तहत पात्र मरीजों को मुफ्त इलाज का लाभ मिलना था। लेकिन अब अस्पताल में आयुष्मान सुविधा उपलब्ध न होने से उन्हें या तो निजी अस्पतालों में जेब ढीली करनी पड़ेगी या फिर दूसरे केंद्रों के चक्कर काटने होंगे।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब सरकारी अस्पताल में ही मुफ्त इलाज की सुविधा नहीं मिलेगी, तो गरीब मरीज आखिर कहां जाएंगे?
जिम्मेदारी किसकी?
मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने जांच कर सेवा बहाल कराने का आश्वासन दिया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएंगी?
एक ओर 15 साल बाद डॉक्टर की तैनाती पर उपलब्धि का दावा किया जा रहा है, तो दूसरी ओर उसी अस्पताल में गरीबों के मुफ्त इलाज की सुविधा बंद हो रही है।

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जनता पूछ रही है—क्या यह स्वास्थ्य सुधार है या आधी-अधूरी व्यवस्था? क्या सरकार और विभाग यह सुनिश्चित करेंगे कि डॉक्टर के साथ-साथ गरीबों का इलाज भी मुफ्त मिले?
फिलहाल काशीपुर में तस्वीर साफ है—इलाज के लिए डॉक्टर तो मिल गईं, लेकिन गरीबों का हक छिन गया। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि सिस्टम कब जागेगा।

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