हवा में झूलता खम्बा- लेपाक्षी मंदिर

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आंध्र प्रदेश के अनन्तपुर जिला में एक गांव है जिसका नाम लेपाक्षी है।यह स्थान बंगलुरू शहर से इसकी दूरी की बात करें तो ये जगह 120 किमी की दूरी पर है।इस गांव का नाम श्रीराम के आगमन पर पड़ा था।सीता राम और लक्ष्मण बनवास के दौरान यहा रहे थे और सीताजी के हरण के दौरान गिद्ध राज जटायु यहाँ घायल अवस्था मे मिले थें।श्रीराम ने घायल जटायु को देखकर लेपाक्षी कहा था।ये शब्द तेलुगु शब्द है,जिसका अर्थ है “उठो पक्षी”।आज यह गांव कलात्मक मंदिरों के लिए जाना जाता है।जिनका निर्माण 16 वी शताब्दी में हुआ था।लेपाक्षी मंदिर विजयनगर शैली के मंदिरों का विलक्षण उदाहरण है।

 

credit: third party image reference

 

मंदिर परिसर में बने हुए खम्भे

यहा विराजित भगवान गणेश की मूर्ति शिल्प का अदभुत नमूना है।इस मंदिर की वास्तुकला की एक खास बात यह है कि इसमें सिर्फ भगवान के मंदिर के साथ नृत्य कला और संगीतकारों का भी चित्रण है।

मजबूत पत्थरो को काटकर उन पर की गई नक्काशी न् सिर्फ लुभावनी हैं बल्कि स्थायित्व लिए हुए हैं।

इस मंदिर में कुल 72 खम्भे है।जिन पर ये अद्धभुत मंदिर टिका हुआ है।वास्तुकला के अनुपम विज्ञान को समेटे हुए इनमे एक खम्भा ऐसा है ,जो हवा में झूलता दिखाई देता है।जमीन और जिस स्थान पर इस खम्भे और भूमि का मिलन होता है,वहा पर खाली जगह है।इसके बीच से कोई भी कपड़ा आसानी से निकल सकता हैं।इन खम्भो की लंबाई 27 एवं चौड़ाई 15 फुट के आसपास है

हवा में रहने वाला खम्भा

मंदिर कछुए के खोल की आकृति की पहाड़ी पर स्थित है।इसको “कूर्म सैला”भी कहा जाता है।इस मंदिर के फैले हुए परिसर में भगवान शिव,विष्णु,और वीरभद्र के मंदिर है।भगवान शिव नायक शासकों के कुलदेवता थे।

लेपाक्षी मंदिर का निर्माण विजयनगर के विरूपन्ना और विरन्ना ने सन 1583 में करवाया था।मंदिर के संदर्भ में एक मान्यता यह भी है कि इसका निर्माण महृषि अगस्त्य ने करवाया था

 

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मंदिर में स्थापित शिवलिंग

हवा में झूलते खम्भे की तकनीक को जानने को लेकर अंग्रेजो की ओर से कई प्रयास किये गए जो नाकाम रहे।इसकी बेहतरीन शिल्प कारीगरी को तोड़ने का प्रयास किया ।अंग्रेजो ने इसे दूसरी जगह स्थान्तरित करने के भी प्रयास किये लेकिन ऐसा करने में सफल नही हो सकें।

 

 

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इस मंदिर की शिल्प कारीगरी भारत इतिहास की कलाकृतियों में एक शानदार और खूबसूरत नमूना है जो इसका आकर्षण है।।

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