77वां गणतंत्र दिवस: पीएम मोदी का विशेष ‘मरून साफा’ और वेशभूषा

खबर शेयर करें -

प्रधानमंत्री मोदी ने इस वर्ष के समारोह के लिए गहरे रंगों और पारंपरिक कढ़ाई का एक सुंदर मिश्रण चुना:

  • साफा: उन्होंने गहरे मरून रंग का साफा पहना, जिस पर सुनहरे रंग की मोर पंख की आकृति की सूक्ष्म और कलात्मक कढ़ाई की गई थी। साफे के अंतिम छोर पर हरा और पीला रंग प्रमुखता से दिखा।

  • बंडी और कुर्ता: सफेद पायजामे के साथ उन्होंने नेवी ब्लू रंग का कुर्ता और उसके ऊपर आसमानी नीले रंग की बंडी (जैकेट) पहनी थी।


🕰️ पिछले वर्षों के प्रमुख आकर्षण: एक नज़र में

प्रधानमंत्री मोदी के गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के साफे हमेशा देश के विभिन्न राज्यों (मुख्यतः गुजरात, राजस्थान और उत्तराखंड) की कला को दर्शाते हैं:

यह भी पढ़ें 👉  यमकेश्वर में जुटे दो राज्यों के 'सारथी': सीएम योगी ने सराहा धामी का विकास मॉडल, साझा किए बचपन के संस्मरण
वर्ष अवसर वेशभूषा का विवरण
2026 77वां गणतंत्र दिवस मरून साफा (मोर पंख कढ़ाई), नेवी ब्लू कुर्ता, आसमानी बंडी।
2025 76वां गणतंत्र दिवस लाल-पीला साफा, सफेद कुर्ता-पायजामा और भूरा कोट।
2024 75वां गणतंत्र दिवस बहुरंगी ‘बांधनी’ साफा (टाई-डाई विधि, गुजरात/राजस्थान)।
2023 गणतंत्र दिवस बहुरंगी राजस्थानी साफा।
2022 गणतंत्र दिवस उत्तराखंड की पारंपरिक टोपी (ब्रह्मकमल के फूल के साथ)।
2021 गणतंत्र दिवस जामनगर की ‘हालारी’ पगड़ी (जामसाहब परिवार द्वारा भेंट)।

🎨 साफे की शैलियां और तकनीक

प्रधानमंत्री के पहनावे में अक्सर इन विशेष कलाओं का प्रयोग किया जाता है:

  1. बांधनी (Bandhani): यह एक ऐसी टाई-डाई तकनीक है जिसमें कपड़े को धागे से बांधकर रंगा जाता है। यह गुजरात और राजस्थान की पहचान है।

  2. जोधपुरी बंधेज: इसमें चमकीले रंगों का प्रयोग होता है, जिसे पीएम ने 2014 के अपने पहले संबोधन में चुना था।

  3. लहरिया (Leheriya): इसमें तिरछी धारियों वाले पैटर्न होते हैं, जिसे पीएम ने 2015 में पीले रंग में पहना था।

यह भी पढ़ें 👉  यमकेश्वर में जुटे दो राज्यों के 'सारथी': सीएम योगी ने सराहा धामी का विकास मॉडल, साझा किए बचपन के संस्मरण

🏛️ सांस्कृतिक महत्व

पीएम मोदी का यह पहनावा मात्र फैशन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक संदेश भी है:

  • विविधता: वे हर बार अलग राज्य की पगड़ी या टोपी पहनकर भारत की ‘विविधता में एकता’ को प्रदर्शित करते हैं।

  • उत्तराखंड से जुड़ाव: 2022 में पहनी गई ब्रह्मकमल वाली टोपी उत्तराखंड की संस्कृति और केदारनाथ के प्रति उनकी गहरी आस्था का प्रतीक थी।

  • परंपरा का सम्मान: जामनगर के राजपरिवार से मिली ‘हालारी’ पगड़ी पहनना क्षेत्रीय परंपराओं और शाही विरासतों के प्रति सम्मान व्यक्त करना था।

यह भी पढ़ें 👉  यमकेश्वर में जुटे दो राज्यों के 'सारथी': सीएम योगी ने सराहा धामी का विकास मॉडल, साझा किए बचपन के संस्मरण

Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad