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बलूनी के बाद त्रिवेंद्र की एंट्री से गदरपुर की सियासत में भूचाल, अरविंद पांडे के घर बढ़ता दिग्गजों का काफिला” , क्या भाजपा में सब कुछ ठीक है?

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राजू अनेजा, गदरपुर।उत्तराखंड की सियासत में इन दिनों गदरपुर विधानसभा सबसे ज्यादा चर्चा का केंद्र बनी हुई है। वजह सिर्फ विधायक अरविंद पांडे और सरकार के बीच बढ़ती तल्खियां नहीं, बल्कि उनके आवास पर लगातार पहुंच रहे भाजपा के बड़े चेहरों का जमावड़ा भी है।
पहले सांसद अनिल बलूनी और अब पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का अरविंद पांडे के निवास पर पहुंचना सियासी गलियारों में बड़े संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
राजनीतिक जानकार इसे महज शिष्टाचार मुलाकात नहीं मान रहे, बल्कि इसे भाजपा के भीतर चल रही अंदरूनी हलचल और शक्ति संतुलन से जोड़कर देखा जा रहा है।

धामी सरकार बनाम पांडे… तल्खियां अब खुलकर सामने

प्रदेश की पुष्कर सिंह धामी सरकार और अरविंद पांडे के बीच पिछले कुछ समय से तनातनी लगातार सुर्खियों में रही है।
अतिक्रमण का मामला हो, बुक्सा समाज की जमीन का विवाद हो या स्थानीय प्रशासनिक फैसले— कई मुद्दों पर पांडे खुलकर अपनी ही सरकार के खिलाफ मुखर दिखाई दिए।
गदरपुर विधानसभा में हालात ऐसे बने कि भाजपा के भीतर की खींचतान अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुकी है।

“टिकट कटेगा?” चर्चा तेज… लेकिन बढ़ता समर्थन दे रहा बड़ा संदेश

विधानसभा चुनाव में अभी समय जरूर है, लेकिन भाजपा के अंदर टिकटों को लेकर कयासबाजी शुरू हो चुकी है।
इसी बीच अरविंद पांडे के आवास पर लगातार बड़े नेताओं की मौजूदगी ने एक नया राजनीतिक संदेश दे दिया है— “पांडे अकेले नहीं हैं।”
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि अगर कोई उनके राजनीतिक कद को कम आंकने की कोशिश कर रहा था, तो उसे यह संदेश साफ मिल गया है कि पांडे आज भी संगठन और बड़े नेताओं के बीच मजबूत पकड़ रखते हैं।
त्रिवेंद्र की मौजूदगी ने क्यों बढ़ाई हलचल?
पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और धामी सरकार के बीच राजनीतिक दूरी किसी से छिपी नहीं है।
ऐसे में उनका अरविंद पांडे के घर पहुंचना कई नए समीकरणों की ओर इशारा कर रहा है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या भाजपा के भीतर समान सोच वाले नेताओं का नया समूह आकार ले रहा है?
या फिर यह सिर्फ संगठन के भीतर शक्ति प्रदर्शन का एक सधा हुआ राजनीतिक संदेश है?

 

पांच बार के विधायक… संगठन में मजबूत पकड़

अरविंद पांडे सिर्फ एक विधायक नहीं, बल्कि संगठन के पुराने और मजबूत चेहरों में गिने जाते हैं।
कट्टर आरएसएस पृष्ठभूमि, जमीनी नेटवर्क और शीर्ष नेतृत्व से सीधा तालमेल उन्हें भाजपा में अलग पहचान देता है।
यही कारण है कि पार्टी भी उनके मामले में कोई जल्दबाजी या जोखिम लेने के मूड में दिखाई नहीं दे रही।

भाजपा के सामने सबसे बड़ा लक्ष्य— “9 में 9”

पिछले चुनावों में भाजपा ऊधमसिंह नगर जिले की 9 सीटों में से केवल 4 पर जीत दर्ज कर पाई थी।
इस बार पार्टी “9 में 9” का लक्ष्य लेकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है।
ऐसे में भाजपा नेतृत्व किसी भी ऐसी अंदरूनी लड़ाई को खुला रूप नहीं देना चाहता, जो चुनावी समीकरण बिगाड़ दे।
लेकिन एक बात तो तय है—
गदरपुर की राजनीति अब सिर्फ स्थानीय नहीं रही… इसकी गूंज देहरादून से दिल्ली तक सुनाई देने लगी है।

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