उत्तराखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: सहमति से बने शारीरिक संबंध ‘बलात्कार’ नहीं, अगर शादी का वादा निभाने में विफल रहे

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नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने लिव-इन रिलेशनशिप और आपसी सहमति से बने संबंधों पर एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक आपसी सहमति से शारीरिक संबंध में रहते हैं, तो केवल विवाह न कर पाने को ‘बलात्कार’ (धारा 376) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।


📝 मामला क्या था? (मसूरी का विवाद)

यह कानूनी विवाद सूरज बोरा नामक व्यक्ति और मसूरी की एक महिला के बीच का था:

  • आरोप: महिला ने आरोप लगाया था कि सूरज ने 45 दिनों के भीतर शादी करने का वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, लेकिन बाद में मुकर गया।

  • पुलिस कार्रवाई: पुलिस ने जांच के बाद आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी, जिसे सूरज बोरा ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।

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🏛️ कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और कानूनी तर्क

जस्टिस आशीष नैथानी ने सुनवाई के दौरान “बलात्कार” और “असफल रिश्ते” के बीच की बारीक रेखा को स्पष्ट किया:

  • प्रारंभिक नीयत का महत्व: कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 376 के तहत दंडित करने के लिए यह साबित करना अनिवार्य है कि शादी का वादा शुरू से ही एक छल (Deceit) था।

  • लंबे समय तक संबंध: अदालत ने पाया कि दोनों पक्ष बालिग थे और उनके बीच लंबे समय तक बार-बार संबंध बने। यह दर्शाता है कि संबंध आपसी सहमति पर आधारित थे, न कि किसी प्रारंभिक धोखाधड़ी पर।

  • असफल रिश्ता बनाम अपराध: कोर्ट ने माना कि यह एक “असफल रिश्ता” है, न कि आपराधिक मामला। एक वयस्क महिला की सहमति केवल इसलिए अमान्य नहीं हो जाती कि रिश्ता विवाह तक नहीं पहुँच पाया।

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🚫 कार्यवाही को बताया ‘मानसिक उत्पीड़न’

हाई कोर्ट ने देहरादून के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के पास लंबित इस मामले और 22 जुलाई 2023 की चार्जशीट को पूरी तरह निरस्त (Quashed) कर दिया। अदालत ने सख्त लहजे में कहा:

“बिना किसी ठोस आधार के आपराधिक कार्यवाही जारी रखना आरोपी का मानसिक उत्पीड़न होगा। कानून का उपयोग टूटे हुए रिश्ते का बदला लेने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।”


💡 फैसले का महत्व

यह फैसला उन मामलों के लिए नजीर (Precedent) बनेगा जहाँ शादी का वादा टूटने पर बलात्कार के मुकदमे दर्ज कराए जाते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि:

  1. वयस्क व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए।

  2. कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग किसी को प्रताड़ित करने के लिए नहीं होना चाहिए।

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