
ठेका लेने को कूटरचित दस्तावेज का सहारा! मेला खत्म हुआ तो सरकारी खजाने में पूरी रकम जमा किए बिना गायब हुआ ठेकेदार
राजू अनेजा, काशीपुर। चैती मेला काशीपुर के वर्ष 2026 के ठेके में कथित फर्जीवाड़े का सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोप है कि कूटरचित हैसियत प्रमाण पत्र के सहारे 3 करोड़ 11 लाख रुपये का दुकानों एवं तहबाजारी का ठेका हासिल किया गया, लेकिन मेला समाप्त होने के बाद ठेकेदार ने सरकारी खजाने में पूरी रकम जमा नहीं की। करीब 1 करोड़ 30 लाख रुपये से अधिक की धनराशि बकाया रहने पर प्रशासन ने जांच कराई और अब पुलिस ने मामले में तीन लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस दस्तावेज के आधार पर करोड़ों रुपये का सरकारी ठेका जारी हुआ, उसकी निविदा प्रक्रिया के दौरान जांच आखिर किस स्तर पर हुई? अगर समय रहते दस्तावेज की पड़ताल हो जाती तो क्या सरकार को करोड़ों की वसूली के लिए इस स्थिति का सामना करना पड़ता?
50 लाख की हैसियत जरूरी, दस्तावेज लगा दिया गया किसी और के नाम का!
वर्ष 2026 के श्री चैती मेले के संचालन के लिए 7 मार्च 2026 को निविदाएं खोली गई थीं। दुकानों एवं तहबाजारी के ठेके की मुख्य शर्तों में कम से कम 50 लाख रुपये की हैसियत प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य था। यह प्रमाण पत्र उपजिलाधिकारी स्तर से नीचे का नहीं होना चाहिए था।
इसी निविदा प्रक्रिया में मैसर्स देव इंटरप्राइजेज, हिम्मतपुर हेमपुर इस्माइल, काशीपुर ने भी हिस्सा लिया। आरोप है कि फर्म की ओर से जो हैसियत प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया, वह बाद की जांच में कूटरचित पाया गया।
उच्च बोलीदाता होने के कारण देव इंटरप्राइजेज के नाम 3 करोड़ 11 लाख रुपये में ठेका जारी कर दिया गया।
मेला खत्म, लेकिन सरकार के खजाने में नहीं पहुंची पूरी रकम
ठेका मिलने के बाद संबंधित पक्षों ने अग्रिम धनराशि जमा कर मेले में कार्य किया। लेकिन मेला समाप्त होने के बाद सरकारी खजाने में पूरी ठेका राशि जमा नहीं हुई।
रिकॉर्ड के मुताबिक कुल 3,11,00,000 रुपये की ठेका राशि में से केवल 1,80,83,777 रुपये जमा किए गए।
यानी 1,30,16,223 रुपये की भारी-भरकम रकम सरकारी खाते में जमा ही नहीं हुई।
बकाया धनराशि की वसूली के लिए मेलाधिकारी ने फर्म की अचल संपत्ति को सरकार में निहित करने की कार्रवाई के लिए तहसीलदार काशीपुर को जांच सौंपी।
जांच में खुला हैसियत प्रमाण पत्र का राज, जिस नाम का था उसी के नाम निकला रिकॉर्ड!
मामले में सबसे चौंकाने वाला खुलासा हैसियत प्रमाण पत्र की जांच में हुआ।
निविदा में उमेश कुमार सिंह के नाम से 29 जनवरी 2026 को जारी बताया गया हैसियत प्रमाण पत्र लगाया गया था। लेकिन जब इसकी जांच ई-डिस्ट्रिक्ट एवं तहसील कार्यालय काशीपुर से कराई गई तो कथित प्रमाण पत्र का रिकॉर्ड ही कुछ और निकला।
जांच में सामने आया कि उक्त हैसियत प्रमाण पत्र महेन्द्र सिंह पुत्र कुंवर सिंह, निवासी ग्राम पंचायत कौली कन्याल पट्टी, तोली, तहसील बंगापानी, जिला पिथौरागढ़ के नाम 5 फरवरी 2026 को जारी हुआ था।
यानी आरोप के मुताबिक जिस प्रमाण पत्र को उमेश कुमार सिंह के नाम दिखाकर निविदा में लगाया गया, सरकारी रिकॉर्ड में वही प्रमाण पत्र किसी दूसरे व्यक्ति के नाम जारी पाया गया।
उपजिलाधिकारी के कथित फर्जी हस्ताक्षर का भी आरोप
मामला केवल गलत दस्तावेज लगाने तक सीमित नहीं है। पुलिस को दी गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि हैसियत प्रमाण पत्र कूटरचित तरीके से तैयार किया गया और उस पर उपजिलाधिकारी काशीपुर के कथित कूटरचित हस्ताक्षर भी किए गए।
प्रशासन की शिकायत में इसे ठेका हासिल करने के उद्देश्य से की गई गंभीर कूटरचना और धोखाधड़ी बताया गया है।
अब पुलिस के सामने यह जांच करना अहम होगा कि फर्जी प्रमाण पत्र तैयार किसने किया, किस स्तर पर तैयार हुआ, निविदा में इसे किसने लगाया और इसके पीछे वास्तव में कौन-कौन लोग शामिल थे।
करोड़ों के ठेके के बाद संपत्ति की जांच में भी सामने आई तस्वीर
बकाया रकम की वसूली के लिए जब फर्म से जुड़े लोगों की संपत्तियों की जांच कराई गई तो वहां भी स्थिति साफ नहीं मिली।
तहसीलदार की जांच रिपोर्ट के अनुसार हेमपुर इस्माइल में एक मकान मौके पर पाया गया, लेकिन वह संबंधित लोगों के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज नहीं मिला। आसपास के लोगों से पूछताछ में मकान स्टांप पर खरीदे जाने की बात सामने आई।
वहीं कृष्णपाल भारद्वाज की अचल संपत्ति के संबंध में जांच में उनके नाम कोई भूमि दर्ज नहीं मिली। उनकी पत्नी के नाम खोखराताल में जमीन दर्ज होने की बात जांच रिपोर्ट में सामने आई है।
फर्म के दो साझेदार, मुख्तारेखास के जरिए ठेके की प्रक्रिया में भागीदारी
शिकायत के अनुसार देव इंटरप्राइजेज के दो साझेदार उमेश कुमार सिंह और ज्योत्सना हैं। उनकी ओर से कृष्णपाल भारद्वाज ने मुख्तारेखास के रूप में निविदा प्रक्रिया में भाग लिया था।
ठेका हासिल करने के बाद मेला संचालित किया गया, लेकिन मेला समाप्त होने के बाद 1.30 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम बकाया रह गई।
प्रशासन की शिकायत में इन तीनों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए हैं और मामले को संगठित तरीके से कूटरचित दस्तावेज के जरिए ठेका हासिल करने से जोड़कर देखा गया है।
अब प्रशासनिक जांच पर भी उठे सवाल—करोड़ों का ठेका मिला तो कागज क्यों नहीं खंगाले गए?
इस पूरे प्रकरण ने चैती मेले की निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
जब निविदा की शर्तों में 50 लाख रुपये की हैसियत प्रमाण पत्र अनिवार्य था और करोड़ों रुपये का ठेका दिया जाना था, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि प्रमाण पत्र की ऑनलाइन अथवा संबंधित तहसील कार्यालय से पुष्टि क्यों नहीं की गई?
अगर प्रमाण पत्र वास्तव में कूटरचित था तो वह सरकारी निविदा पत्रावली तक कैसे पहुंचा?
अगर जांच हुई थी तो फर्जीवाड़ा पकड़ में क्यों नहीं आया?
और अगर जांच नहीं हुई तो करोड़ों के सरकारी ठेके में दस्तावेजों की जांच की जिम्मेदारी किसकी थी?
इन सवालों का जवाब अब जांच के साथ-साथ प्रशासनिक स्तर पर भी तलाशना जरूरी होगा।
ऊंची बोली लगाने वालों के लिए भी चैती मेला बना सबक!
चैती मेले की दुकानों और तहबाजारी के ठेके में करोड़ों की बोली लगना हमेशा आकर्षण का विषय रहा है। ठेकेदार मेले की संभावित कमाई का अनुमान लगाकर ऊंची बोली लगाते हैं।
लेकिन इस मामले ने यह भी दिखा दिया कि ऊंची बोली लगाकर ठेका हासिल करना और उसके बाद पूरी रकम सरकार को जमा करना दो अलग बातें हैं।
करोड़ों का ठेका लेने के बाद जब 1.30 करोड़ रुपये से अधिक की रकम सरकारी खजाने में जमा नहीं हुई, तो यह प्रकरण भविष्य में निविदा प्रक्रिया में शामिल होने वाले ठेकेदारों के लिए भी बड़ा सबक माना जा सकता है।
तीन के खिलाफ मुकदमा, अब पुलिस खोलेगी फर्जीवाड़े की पूरी परतें
आईटीआई कोतवाली पुलिस ने एसडीएम/मेलाधिकारी कार्यालय के रीडर राहुल जोशी की तहरीर के आधार पर उमेश कुमार सिंह, ज्योत्सना और कृष्णपाल भारद्वाज के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है।
पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ बीएनएस की धारा 316(5), 318(4), 336, 338 और 340 के तहत मुकदमा दर्ज किया है। मामले की जांच एसएसआई अरविंद बहुगुणा को सौंपी गई है।
अब जांच में यह सामने आना बाकी है कि कथित फर्जी प्रमाण पत्र की पूरी कहानी क्या है, इसे तैयार किसने किया, निविदा में कैसे लगाया गया और सरकार की 1,30,16,223 रुपये की बकाया धनराशि की वसूली कैसे होगी।
सबसे बड़ा सवाल: करोड़ों के सरकारी ठेके की फाइल में फर्जी हैसियत प्रमाण पत्र पहुंचा कैसे?
जांच सिर्फ ठेकेदार तक सीमित रहेगी या निविदा प्रक्रिया की जिम्मेदारी भी तय होगी—यही अब देखने वाली बात होगी।
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