देहरादून: उत्तराखंड विधानसभा ने हाल ही में ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक 2025’ पारित कर दिया है। यह विधेयक केवल मुस्लिम मदरसों तक सीमित न रहकर राज्य के सभी अल्पसंख्यक समुदायों – सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी – के शैक्षणिक संस्थानों को भी समान रूप से अल्पसंख्यक दर्जे का लाभ प्रदान करेगा। इसे अन्य राज्यों के लिए एक दूरदर्शी और प्रभावी कदम माना जा रहा है।
विधेयक के प्रमुख प्रावधान
इस नए विधेयक के लागू होने के बाद, पुराने ‘उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम 2016’ और संबंधित नियमों को समाप्त कर दिया जाएगा। अब सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए एक समान नियामक संस्था, ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ का गठन किया जाएगा। इस प्राधिकरण के मुख्य कार्य निम्नलिखित होंगे:
- संस्थानों को मान्यता देना और उनके पंजीकरण को सुनिश्चित करना।
- वित्तीय लेन-देन पर निगरानी रखना, पारदर्शिता बढ़ाना और अनियमितताओं पर रोक लगाना।
- सभी अल्पसंख्यक बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना।
- शैक्षणिक संस्थानों में बच्चों की प्रगति का मूल्यांकन उत्तराखंड बोर्ड के मानकों के आधार पर करना।
- धार्मिक शिक्षा की अनुमति होगी, लेकिन संस्थानों को बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से अलग नहीं करना होगा।
क्यों पड़ी इस कदम की जरूरत?
धामी सरकार ने यह कदम मदरसों में लंबे समय से चली आ रही अनियमितताओं के बाद उठाया है। रिपोर्ट के अनुसार, छात्रवृत्ति वितरण में गड़बड़ी, मिड-डे मील में विसंगतियाँ, वित्तीय पारदर्शिता की कमी और अवैध मदरसों के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर मुद्दे सामने आए थे। राज्य में 450 पंजीकृत मदरसों के अलावा, 500 से अधिक अवैध रूप से संचालित हो रहे थे, जिनमें से लगभग 200 को दिसंबर 2024 में बंद कराया गया था। पिछले मदरसा बोर्ड की निष्क्रियता को देखते हुए सरकार ने यह फैसला लिया कि शिक्षा को किसी एक समुदाय की संकीर्ण सीमा से बाहर निकालकर एक व्यापक और समावेशी रूप दिया जाए।
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और दूरगामी परिणाम
यह विधेयक न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है। इसने इस बहस को जन्म दिया है कि क्या केवल एक समुदाय के लिए बने कानून पर्याप्त हैं, जबकि अन्य अल्पसंख्यक समुदाय उपेक्षित महसूस करते हैं। यह विधेयक शिक्षा का केंद्र धार्मिक पहचान के बजाय बच्चों के भविष्य को बनाता है। यह अन्य राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश, को भी प्रेरणा दे सकता है ताकि वे भी अपने यहाँ एक अधिक न्यायसंगत और पारदर्शी शिक्षा प्रणाली स्थापित कर सकें।



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