
राजू अनेजा, देहरादून ।उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सच्चा जनसेवक पद से नहीं, विचारों से पहचाना जाता है। लंबे सार्वजनिक जीवन में शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्रवाद के लिए समर्पित रहे कोश्यारी ने अब समाज के लिए एक ऐसा निर्णय लिया है, जो आने वाली पीढ़ियों को जीवन का अर्थ समझाएगा। उन्होंने अपनी देहदान करने का संकल्प लेकर समाजसेवा की एक अनूठी और प्रेरणादायक मिसाल कायम की है।
भगतसिंह कोश्यारी का यह फैसला केवल एक औपचारिक घोषणा नहीं, बल्कि उस सोच का विस्तार है जिसमें व्यक्ति अपने अस्तित्व को भी समाज के हित में समर्पित कर देता है। देहदान के माध्यम से चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में अमूल्य योगदान मिलता है, जिससे भविष्य के डॉक्टरों को सीखने और हजारों मरीजों की जान बचाने में सहायता मिलती है।
राजनीति में ऊँचे पदों पर रहते हुए भी सादगी, नैतिकता और मूल्यों को जीवन का आधार बनाने वाले कोश्यारी का यह कदम बताता है कि सार्वजनिक जीवन का अंतिम लक्ष्य आत्मप्रचार नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व होता है। उनका यह निर्णय उस दौर में विशेष महत्व रखता है, जब अधिकतर लोग मृत्यु के बाद की रस्मों और परंपराओं तक सीमित सोच रखते हैं।
देहदान का संकल्प लेकर भगतसिंह कोश्यारी ने न सिर्फ उत्तराखंड, बल्कि पूरे देश को यह संदेश दिया है कि मानव शरीर भी मृत्यु के बाद ज्ञान और जीवन का स्रोत बन सकता है। यह पहल समाज में जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ उन हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बनेगी, जो कुछ अलग और बड़ा करने की सोच रखते हैं।
निस्संदेह, यह निर्णय भगतसिंह कोश्यारी को केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक विचारशील समाजसेवक के रूप में स्थापित करता है—जो सत्ता के बाद भी सेवा की राह पर अडिग है।


