उत्तराखंड की मसान की होली, श्मशान घाट की राख और रंगों से मनाया जाने वाला पर्व

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मसाने की होली एक पारंपरिक उत्सव है, जो यूं तो उत्तर प्रदेश के वाराणसी में मनाया जाता है लेकिन दो साल से अब हरिद्वार में भी खेली जा रही है. बुधवार को महामंडलेश्वर भवानी शंकरानंद गिरी किन्नर के नेतृत्व में खड़खड़ी श्मशान घाट पर मसाने की होली खेली गई, इसमें श्मशान की राख और रंगों से होली खेली गई.

महामंडलेश्वर के नेतृत्व में देवी की मूर्ति को सिर पर धारण किए गाजे-बाजे के साथ नाचते गाते हुए श्मशान घाट पहुचे, जहां विधि-विधान के साथ पारंपरिक तरीके से पूजा की गई और होली खेली गई. बाद में गंगा पर जाकर होली खेली गई.

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कैसे मनाई जाती है मसान होली?

मसाने की होली, आम होली के एक दिन पहले मनायी जाती है और इसमें लोग मसानों (श्मशान घाटों) पर इकट्ठा होकर होली मनाते हैं. इस दौरान रंग, गुलाल और पानी के साथ होली खेली जाती है और साथ ही साथ पारंपरिक गीत और नृत्य भी किया जाता है.

महामंडलेश्वर भवानी शंकरानंद गिरी का कहना है कि कलयुग में कुछ ऐसी परंपराएं हुई, जो लुप्त हो गई थीं. सनातन धर्म में जब संतों के समाज ने हमें वापस वही जगह दी है, तो मेरा कार्य है कि जो परंपरा, सनातन, समाज की है और वह शांति के लिए है. यह मसाने की होली बनारस में मनती है और जितने भी श्मशान हैं, जहां मसान हैं वहां किन्नर हैं और किन्नर को भस्म होली का वेदों में उल्लेख है. वही परंपरा मैंने शुरू की है कि आप ने सब कुछ किया है.

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‘हमारा कर्तव्य बनता है कि…’

भवानी शंकरानंद गिरी कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में जब हमें अधिकार दिया तो हमारी संस्कृति भी हमारे हाथ में आई. लोगों के सहयोग से संतों ने अपना अपना पुरषार्थ दिखाया है और समाज ने हमें दिल से लगाया है. हमारा भी कर्तव्य बनता है कि आने वाली जनरेशन के लिए जो परंपराएं जिंदा रखें.

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उन्होंने आगे कहा कि इस परंपरा को लेकर हमने कोशिश की है, सनातन धर्म का एहसान है कि हमारी सभ्यता वापस आई है. समाधान, संविधान से अपना कोई भी उल्लेख निकाला जा सकता है लेकिन सनातन से मान, सम्मान, मर्यादा, भाईचारा और जितनी भी खोई हुई परंपरा है उसके लिए हमने वापस जगह तैयार की है.

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