‘मेरी बोली मेरी पहचान’: जड़ों की ओर वापसी की कहानी
यह एक बहुत ही मार्मिक और महत्वपूर्ण कहानी है, जो आधुनिक जीवन की चुनौतियों और सांस्कृतिक जड़ों के महत्व को दर्शाती है।
‘मेरी बोली मेरी पहचान’: जड़ों की ओर वापसी की कहानी
गोकुलानंद जोशी द्वारा लिखित यह कहानी, उत्तराखंड के दो दोस्तों—नीरज और दीपा—के जीवन के माध्यम से मातृभाषा और संस्कृति के महत्व को रेखांकित करती है। यह कहानी दिखाती है कि कैसे शहरी जीवन की चमक-दमक हमें अपनी जड़ों से दूर कर सकती है, और विपरीत परिस्थितियों में ही हमें अपनी असली पहचान का मूल्य समझ आता है।
🧑🤝🧑 कहानी का सार
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बचपन की दोस्ती और दूरी: नीरज और दीपा उत्तराखंड के पहाड़ में पले-बढ़े। लेकिन नीरज के परिवार के दिल्ली पलायन के कारण दोनों की राहें जुदा हो गईं। दीपा गाँव में ही रहकर अपनी बोली, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी रही, जबकि नीरज दिल्ली में पढ़ता रहा और धीरे-धीरे अपनी पहाड़ी भाषा और रीति-रिवाजों से कटता चला गया।
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पहचान का संकट: 10-12 वर्षों तक पहाड़ से दूर रहने के कारण नीरज के लिए गाँव, पथरीले रास्ते और पहाड़ी बोली सब कुछ अनजाना हो गया था। जब 2020 के लॉकडाउन के दौरान उनका परिवार पहाड़ लौटा, तो नीरज एक पर्यटक जैसा महसूस कर रहा था, जिसे अपनी मातृभाषा (कुमाऊनी) का बिलकुल ज्ञान नहीं था।
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पुनर्मिलन और सांस्कृतिक शिक्षा: दीपा ने नीरज को अपनी जड़ों से दोबारा जोड़ा। उसने नीरज को गाँव की संस्कृति, बोली और रीति-रिवाजों के बारे में बताया। दीपा के प्रयास और जागर (स्थानीय धार्मिक कार्यक्रम) जैसे अनुभवों ने नीरज को अपनी जड़ों से भावनात्मक रूप से जोड़ना शुरू किया।
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आत्म-निर्भरता और वापसी: एक साल बाद जब नीरज के पिता को नौकरी दोबारा जॉइन करने का मौका मिला, तो उन्होंने अस्वीकार कर दिया और गाँव में ही खुद का व्यवसाय शुरू करने का निर्णय लिया। नीरज गाँव के कॉलेज में पढ़ने लगा और सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होकर अपनी संस्कृति को पूरी तरह अपना लिया।
📢 लेखक का संदेश: पहचान के बिना इंसान कुछ भी नहीं
लेखक गोकुलानंद जोशी इस कहानी के माध्यम से एक गहरा सामाजिक संदेश देना चाहते हैं:
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जड़ों से दूरी आत्मिक क्षति है: शहरों की सुख-सुविधाएँ और आधुनिकता हमें प्रगति तो देती है, लेकिन अगर हम इसके बदले अपनी मातृभाषा, लोकदेवताओं और परंपराओं को भूल जाते हैं, तो यह प्रगति नहीं बल्कि अपनी आत्मा से दूरी है।
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मातृभाषा में गर्व: लेखक समाज से विनम्र निवेदन करते हैं कि अगर आप पहाड़ी हैं, तो पहाड़ी भाषा बोलने में गर्व करें। किसी के सवाल उठाने या हँसने पर झुकने के बजाय गर्व से कहें: “यह मेरी पहचान है, और पहचान के बिना इंसान कुछ भी नहीं होता।“
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दीपा और नीरज का प्रतीक:
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दीपा: वह व्यक्ति जो अपनी जड़ों से जुड़ा रहकर असली रूप से समृद्ध है, भले ही उसके पास साधन कम हों।
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नीरज: वह व्यक्ति जिसे जीवन की दौड़ में आगे बढ़ते-बढ़ते अपनी मिट्टी की पुकार आखिरकार सुनाई देती है।
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लेखक गोकुलानंद जोशी उत्तराखंड (बागेश्वर और नैनीताल) के स्थायी निवासी हैं और उन्होंने इस मार्मिक कहानी के माध्यम से सांस्कृतिक संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया है।
✍️ लेखक: गोकुलानंद जोशी (उत्तराखंड)
स्थाई पता:
करासमाफ़ी, काफलीगैर,
जिला – बागेश्वर,
उत्तराखंड
वर्तमान पता:
पश्चिमी राजीव नगर, घोड़ानाला, बिंदुखत्ता,
जिला – नैनीताल,
उत्तराखंड
आप इस कहानी के संदेश पर अपनी राय साझा कर सकते हैं, या जानना चाहेंगे कि उत्तराखंड में मातृभाषा के संरक्षण के लिए सरकार क्या प्रयास कर रही है।

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