हे भगवान ! कुमाऊं में कोई हादसा न हो, —वेंटिलेटर पर है सुशीला तिवारी अस्पताल का न्यूरो सर्जरी विभाग, एक डॉक्टर का कार्यकाल खत्म, दूसरे ने थमाया इस्तीफा

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11 फरवरी के बाद कुमाऊं के ब्रेन इंजरी, स्ट्रोक और सड़क हादसों के मरीज भगवान भरोसे

राजू अनेजा,हल्द्वानी। कुमाऊं के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सुशीला तिवारी की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। जिस न्यूरो सर्जरी विभाग पर सड़क दुर्घटनाओं, ब्रेन इंजरी, स्ट्रोक और रीढ़ की गंभीर चोटों में मरीज की जान टिकी रहती है, वही विभाग आज डॉक्टरों की कमी नहीं बल्कि सरकारी लापरवाही की वजह से वेंटिलेटर पर पहुंच चुका है।
स्थिति यह है कि अस्पताल में तैनात एकमात्र न्यूरो सर्जन का कार्यकाल 11 फरवरी को समाप्त हो रहा है, जबकि बेस अस्पताल से अटैच दूसरे न्यूरो सर्जन ने इस्तीफा देकर पहले ही विदा ले ली है। बावजूद इसके, चिकित्सा शिक्षा निदेशालय और शासन स्तर पर अब तक न करार बढ़ाने का ठोस आदेश जारी हुआ, न ही नई नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी हो सकी।
इलाज की जगह मरीजों को मिल रही मायूसी
पिछले एक सप्ताह से न्यूरो सर्जरी से जुड़े मरीज इलाज के लिए अस्पताल पहुंच रहे हैं, लेकिन डॉक्टर न मिलने के कारण उन्हें बैरंग लौटना पड़ रहा है।
दूर-दराज पहाड़ी जिलों—बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत और अल्मोड़ा से आने वाले मरीजों को अस्पताल पहुंचने के बाद पता चल रहा है कि न्यूरो सर्जरी की सुविधा ठप है।

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एक ओर लंबा सफर और खर्च, दूसरी ओर इलाज न मिलने की मजबूरी।

आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के सामने अब निजी अस्पतालों में महंगा इलाज कराने या फिर किस्मत के भरोसे लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
अक्टूबर में ही खत्म हो चुका था करार
चौंकाने वाली बात यह है कि न्यूरो सर्जन का तीन साल का करार अक्टूबर में ही समाप्त हो गया था। उस समय सिर्फ तीन महीने का अस्थायी विस्तार दिया गया।
अब वह अवधि भी 11 फरवरी को खत्म हो रही है, लेकिन इतने महीनों में न स्थायी समाधान निकाला गया, न नई नियुक्ति सुनिश्चित की गई।

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दुर्घटनाओं में सबसे अहम होता है न्यूरो विभाग

 

सुशीला तिवारी अस्पताल की ओपीडी में रोज़ाना करीब 2500 मरीज पहुंचते हैं, जिनमें से 260 से अधिक मरीज न्यूरो सर्जरी विभाग से संबंधित होते हैं।
पर्वतीय जिलों में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं के गंभीर मरीजों को सबसे पहले इसी अस्पताल में लाया जाता है।
सिर में गंभीर चोट, रीढ़ की हड्डी की समस्या, ब्रेन स्ट्रोक और इमरजेंसी सर्जरी—इन सभी मामलों में न्यूरो सर्जरी विभाग जीवन और मौत के बीच की आखिरी कड़ी होता है।
हफ्ते में दो से तीन दिन ऑपरेशन तय रहते हैं, लेकिन मौजूदा हालात में ऑपरेशन थिएटर से ज्यादा सक्रिय प्रशासनिक फाइलें नजर आ रही हैं।

प्रशासन के बयान, समाधान नदारद

“नए न्यूरो सर्जन की नियुक्ति की जानी है। मैं अभी बाहर हूं, एक-दो दिन में आकर व्यवस्थाएं सुधारने का प्रयास किया जाएगा।”
— डॉ. जीएस तितियाल, प्राचार्य, राजकीय मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी

 

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“जब तक नए सर्जन की नियुक्ति नहीं होती, वर्तमान न्यूरो सर्जन का कार्यकाल एक-दो माह के लिए बढ़ाने के लिए शासन स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं।”
— डॉ. अजय आर्या, निदेशक चिकित्सा शिक्षा, उत्तराखंड

 

लेकिन सवाल यह है कि इलाज ‘प्रयास’ से नहीं, डॉक्टर की मौजूदगी से होता है।
और हादसा तारीख देखकर नहीं होता।
सीधा और तीखा सवाल अगर 11 फरवरी के बाद किसी सड़क हादसे में गंभीर ब्रेन इंजरी हो जाए,अगर किसी मरीज को अचानक स्ट्रोक आ जाए,अगर किसी बच्चे के सिर में गंभीर चोट लग जाए—तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?आज सुशीला तिवारी अस्पताल का न्यूरो सर्जरी विभाग डॉक्टरों की कमी से नहीं,
बल्कि सिस्टम की उदासीनता से दम तोड़ रहा है।

 

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