काव्य समीक्षा: ‘गांव की पुकार’ – लोकतंत्र की जमीनी हकीकत का आइना
कवि गोकुलानंद जोशी जी की यह कविता ‘गांव की पुकार’ उत्तराखंड के ग्रामीण परिवेश में चुनावी विसंगतियों और व्यवस्था पर एक करारा प्रहार है। कुमाऊनी शब्दों के पुट के साथ लिखी गई यह रचना आज के दौर की चुनावी हकीकत को बड़े ही बेबाक ढंग से बयां करती है।
यहाँ इस कविता का एक भावपूर्ण विश्लेषण और सारांश दिया गया है:
मूल स्वर: सामाजिक चेतना और राजनैतिक कटाक्ष
कब मिले बड़न अपन गांव प्रधान,
तब करण गांव में सुधार।
चुनाव दिन आया सबंगे याद उ समस्या।
दारू बोतल नोटा गड्डी,
बंद कर दियो सब ने कि जबान।
सही नेता कब है निबड़न प्रधान,
डबल रुतबा दिखावे खरीदनी वोट।
जस जनता उससे नेता,
उनर आंख में काव पट बादबेर करनी राज।
गांव विकास ठप्प छू,
प्रधाना घर ठस छु।
रोजगार नाम पर ₹2000 दिजा,
कामकाज नाम पर एक टीना टुकड़ चिपक जानी।
वादा तो यस यस करनी,
जैसी तनर जस नेता आज तक हुनला ने।
जीतवे उन्हीं तो पत चलू,
काम नी करणक मामूल में।
उनर हबेर चार आऊं हगिले रूनी,
कब मिले बनूं अपन गांव प्रधान।
नहीं करूं तनर जस काम।
हर कैगे दिलोंन रोजगार,
अपने घर में नी हो खाणू साग।
लेकिन जनता घर में,
पागो पिनाऊ साग।
एक बार मिगे बढ़ाओ प्रधान।
अपण घर में नी हो उजाऊ।
तना घर में लागी हो,
सोलर लाइट।
एक बार मिगे बढ़ाओं प्रधान,
जीते बे दिखाओ प्रधान।
हर घर दिलों नं रोजगार,
कोल नी रोल बेरोजगार।
1. चुनावी प्रलोभन और जनता की खामोशी
कविता की शुरुआती पंक्तियां उस कड़वे सच को उजागर करती हैं, जहाँ चुनाव आते ही समस्याओं की याद तो दिलाई जाती है, लेकिन ‘दारू की बोतल’ और ‘नोटों की गड्डी’ के आगे जनता की आवाज दबा दी जाती है। कवि सवाल करते हैं कि क्या शराब और पैसों से खरीदी गई चुप्पी कभी गांव का भला कर सकती है?
2. विकास बनाम व्यक्तिगत समृद्धि
जोशी जी ने बहुत ही सटीक कटाक्ष किया है:
“गांव विकास ठप्प छू, प्रधाना घर ठस छु।”
अर्थात गांव का विकास तो रुका हुआ है, लेकिन प्रधान का घर सुविधाओं से भरा (ठस) है। यह पंक्ति सीधे तौर पर उन प्रतिनिधियों पर निशाना साधती है जो जनसेवा के नाम पर निजी स्वार्थ सिद्ध करते हैं।
3. झूठे वादों की पोटली
कविता में ‘रोजगार के नाम पर ₹2000’ और ‘काम के नाम पर टीन का टुकड़ा’ जैसे उदाहरणों से यह दिखाया गया है कि कैसे बुनियादी जरूरतों को चुनावी रेवड़ियों में बदल दिया गया है। जीतने से पहले किए गए बड़े-बड़े वादे जीत के बाद ‘काम न करने के बहानों’ में बदल जाते हैं।
4. एक आदर्श प्रधान का संकल्प
कविता के उत्तरार्ध में कवि एक ‘सच्चे प्रधान’ की परिकल्पना पेश करते हैं। एक ऐसा प्रतिनिधि जो:
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खुद के घर में अभाव होने पर भी जनता के घर में ‘पिनाऊ (अरबी) का साग’ और खुशहाली देखना चाहता हो।
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अपने घर में उजाला होने से पहले गांव की गलियों में ‘सोलर लाइट’ देखना चाहता हो।
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जिसका लक्ष्य केवल कुर्सी पाना नहीं, बल्कि ‘हर घर रोजगार’ सुनिश्चित करना हो।
प्रमुख कुमाऊनी एवं स्थानीय संदर्भ:
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पागो पिनाऊ साग: स्थानीय खान-पान और संपन्नता का प्रतीक।
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ठस: संपन्नता या भरा हुआ होना।
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नीबड़न: निबटना या बनना।
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बिंदुखत्ता और बागेश्वर: कवि का वर्तमान और स्थाई पता उनके उत्तराखंड की माटी से गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।
निष्कर्ष:
गोकुलानंद जोशी जी की यह रचना केवल एक कविता नहीं, बल्कि हर उस ग्रामीण की व्यथा है जो चुनाव दर चुनाव विकास की बाट जोह रहा है। यह कविता मतदाताओं को जागरूक करने का संदेश देती है कि वे अपना वोट शराब या पैसों के लिए न बेचें, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व को चुनें जो सच में ‘गांव का सुधार’ करना चाहता हो।
कवि परिचय: गोकुलानंद जोशी जी वर्तमान में नैनीताल के बिंदुखत्ता में निवास कर रहे हैं, जबकि उनका मूल संबंध बागेश्वर के काफलीगैर क्षेत्र से है। उनकी लेखनी में पहाड़ की पीड़ा और विकास की छटपटाहट साफ झलकती है।

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