क्या स्कूल बदल दें इस बार…? कम अंक आए तो स्कूल नहीं, सोच बदलिए, स्कूल बदलना हल नहीं, मार्गदर्शन है समाधान: उर्वशी दत्त बाली

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राजू अनेजा, काशीपुर।परीक्षा के इस संवेदनशील दौर में, जब बच्चों के अंक माता-पिता की सबसे बड़ी चिंता बन जाते हैं, ऐसे समय में महापौर दीपक बाली की धर्मपत्नी उर्वशी दत्त बाली ने समाज के सामने एक अहम और सोचने पर मजबूर करने वाला सवाल रखा है— क्या स्कूल बदल देना ही हर समस्या का समाधान है?
उनका मानना है कि हर बच्चे के पास दिन में समान 24 घंटे होते हैं, फर्क केवल उस दिशा का होता है, जो उसे घर से मिलती है। यह लेख बच्चों से अधिक माता-पिता की सोच, जिम्मेदारी और मार्गदर्शन पर आत्ममंथन की एक विनम्र लेकिन जरूरी कोशिश है।
24 घंटे सबके पास, फर्क सिर्फ़ दिशा का
उर्वशी दत्त बाली का कहना है कि चाहे बच्चा कक्षा में प्रथम आए या पढ़ाई में संघर्ष कर रहा हो, समय सभी के पास बराबर होता है। फर्क समय का नहीं, बल्कि उसके सही उपयोग और दी गई दिशा का है। इसके बावजूद जैसे ही बच्चे के अंक कम आते हैं, माता-पिता का पहला फैसला स्कूल बदलने का होता है। जबकि सच्चाई यह है कि टॉपर और संघर्षरत छात्र—दोनों को उसी स्कूल, उसी कक्षा, उन्हीं शिक्षकों और उन्हीं किताबों से शिक्षा मिलती है। ऐसे में हर बार दोष स्कूल या शिक्षक पर डालना कितना जायज़ है, यह सवाल खड़ा होता है।
स्कूल नहीं, घर से तय होती है सफलता की राह
उन्होंने कहा कि एक बच्चा दिन के लगभग 17–18 घंटे घर में और केवल 5–6 घंटे स्कूल में रहता है। स्कूल केवल दिशा देता है, लेकिन उस दिशा पर चलना सिखाना माता-पिता की जिम्मेदारी होती है। बच्चों को पूरी तरह स्कूल और ट्यूशन के भरोसे छोड़ देना समाधान नहीं हो सकता। ज़रूरत है कि माता-पिता बच्चे की दिनचर्या पर ध्यान दें, उसे समय प्रबंधन सिखाएँ, उसकी मेहनत को समझें और उससे नियमित संवाद बनाए रखें। जब बच्चा अपने समय और प्रयास को खुद समझने लगता है, तो नतीजे अपने आप बदलने लगते हैं।
शांत मन, अनुशासन और मेहनत से बनता भविष्य
उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि पढ़ाई से पहले मन को शांत करना भी सही दिशा का अहम हिस्सा है। बच्चों को यह आदत सिखाई जानी चाहिए कि वे पढ़ाई शुरू करने से पहले कुछ पल ठहरें और मन को स्थिर करें—जैसे 21 बार आँखें बंद कर “ॐ भूर् भुवः स्वः” का जप। यह कोई धार्मिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एकाग्रता बढ़ाने का सरल अभ्यास है। परीक्षा के इस दौर में संदेश साफ है—अच्छे अंक आएँ तो खुशी मनाइए और कम आएँ तो हौसला न खोइए। क्योंकि बच्चों का भविष्य केवल मार्क्स से नहीं, बल्कि अनुशासन, मेहनत और सही मार्गदर्शन से बनता है। और अगर आने वाली पीढ़ी को बेहतर बनाना है, तो सबसे पहले माता-पिता को अपनी सोच और जिम्मेदारी की दिशा सही करनी होगी।
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