उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता अधिनियम (UFRA): 7 साल, 62 मामले और शून्य सजा

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उत्तराखंड में ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ को रोकने के लिए बनाए गए सख्त कानून (UFRA) के जमीनी असर और कानूनी परिणामों को लेकर एक महत्वपूर्ण विश्लेषण सामने आया है। इंडियन एक्सप्रेस की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, कानून की सख्ती और बढ़ते मुकदमों के बावजूद अदालतों में आरोप साबित कर पाना पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

RTI और अदालती रिकॉर्ड के आधार पर इस रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष नीचे दिए गए हैं:

रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में सितंबर 2025 तक कुल 62 मामले दर्ज किए गए, लेकिन अब तक किसी भी आरोपी को इस कानून के तहत सजा नहीं सुनाई गई है।

📊 मुकदमों का लेखा-जोखा (RTI डेटा)

  • कुल दर्ज मामले: 62 (सितंबर 2025 तक)।

  • सुनवाई पूरी हुई: 05 मामलों में।

  • सजा की दर (Conviction Rate): 0% (सभी 5 मामलों में आरोपी बरी)।

  • खारिज मामले: कम से कम 07 मामले सुनवाई के दौरान ही खत्म हो गए।

  • जमानत स्थिति: 39 मामलों में से अधिकांश आरोपी फिलहाल जमानत पर बाहर हैं।

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🔍 अदालतों में मामले क्यों टिक नहीं पा रहे?

रिपोर्ट में बरी किए गए मामलों के पीछे कई बड़े कारण बताए गए हैं:

  1. शिकायतकर्ताओं का मुकरना: कई मामलों में शिकायत करने वाला व्यक्ति (अक्सर परिवार का सदस्य) अदालत में अपने बयान से पलट गया।

  2. सहमति (Consent): कई मामलों में महिलाओं ने अदालत में स्पष्ट कहा कि वे अपनी मर्जी से साथ गई थीं और किसी भी तरह का दबाव नहीं था।

  3. थर्ड-पार्टी शिकायतें: कुछ मामले ऐसे लोगों ने दर्ज कराए जिनका पीड़ित से सीधा संबंध नहीं था। अदालतों ने इसे व्यक्तिगत अधिकारों का हनन नहीं माना।

  4. पुख्ता सबूतों का अभाव: पुलिस लालच, धोखे या जबरदस्ती के आरोपों को वैज्ञानिक या दस्तावेजी तौर पर साबित करने में विफल रही।

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🛡️ ‘अमन सिद्दीकी केस’ और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

इस रिपोर्ट में अमन सिद्दीकी के मामले का विशेष उल्लेख है:

  • विवाद: शादी आपसी सहमति और परिवार की रजामंदी से हुई थी, फिर भी उन्हें 6 महीने जेल में रहना पड़ा।

  • सुप्रीम कोर्ट का रुख (मई 2025): कोर्ट ने जमानत देते हुए कहा कि जब दो बालिगों की शादी मर्जी और परिवार की सहमति से हुई है, तो कानून को इसमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए।


📜 कानून का सफर: 2018 से 2025 तक

उत्तराखंड सरकार ने समय-समय पर इस कानून को और अधिक कठोर बनाया है:

  • 2018: कानून पहली बार लागू हुआ।

  • 2022: सजा की अवधि को बढ़ाया गया।

  • 2025 (प्रस्तावित): सजा को 20 साल से उम्रकैद तक करने का प्रावधान किया गया, हालांकि राज्यपाल ने तकनीकी त्रुटियों के कारण इसे पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया है।

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📈 बढ़ते मुकदमों का ट्रेंड

रिपोर्ट बताती है कि 2022 के बाद से मामलों की संख्या में तेजी आई है:

  • 2023: सबसे ज्यादा 20 मामले दर्ज हुए।

  • 2025: सितंबर तक ही 18 मामले दर्ज हो चुके थे।

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