राजू अनेजा, लालकुआं। बिंदुखत्ता… जहां हर चुनाव में सपनों को जमीन देने के वादे होते हैं, लेकिन हकीकत फाइलों से बाहर ही नहीं निकलती। करीब 80 हजार लोग आज भी अपने ही घर की जमीन पर “हक” का इंतजार कर रहे हैं। चार साल तक वादों की गूंज सुनने के बाद अब जब चुनाव सिर पर हैं, तो सियासत की धुन बदल गई है—और जिम्मेदारी का रास्ता सीधे केंद्र की ओर मोड़ दिया गया है।
सीएम का भरोसा, लेकिन राह दिल्ली से
सर्किट हाउस में हुई बैठक में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक बार फिर भरोसा दिलाया कि बिंदुखत्ता सरकार की प्राथमिकता में है। अधिकारियों को राजस्व गांव का प्रस्ताव आगे बढ़ाने के निर्देश भी दिए गए। लेकिन इसी के साथ यह संकेत भी साफ कर दिया गया कि इस मुद्दे का अंतिम हल केंद्र सरकार के स्तर पर ही निकलेगा।
चार साल… सिर्फ इंतजार, सिर्फ भरोसा
इन चार वर्षों में बिंदुखत्ता के लोगों ने हर बयान को उम्मीद की तरह सुना, हर घोषणा को अपने हक की शुरुआत माना। लेकिन हर बार उम्मीद अधूरी रह गई। न राजस्व गांव का दर्जा मिला, न भूमिधरी अधिकार—बस “प्रक्रिया जारी है” का भरोसा मिलता रहा।
पहले क्यों नहीं दिखा केंद्र का रास्ता? चार साल की खामोशी पर उठते सवाल
अब इस पूरे घटनाक्रम में सबसे तीखा सवाल यही बनकर उभरा है—अगर इस मुद्दे का हल केंद्र से ही निकलना था, तो चार साल तक राज्य स्तर पर सिर्फ बयानबाजी क्यों होती रही? पहले क्यों नहीं हुई ठोस पैरवी?
यह सवाल अब सिर्फ राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम जनता के बीच भी गूंज रहा है। लोगों का कहना है कि अगर शुरुआत से ही केंद्र स्तर पर मजबूती से पहल की जाती, तो शायद आज स्थिति अलग होती।
चार से बज रही राजस्व गांव की बंसी
इधर स्थानीय विधायक मोहन सिंह बिष्ट की भूमिका अब चर्चा के केंद्र में है। लोग पूछ रहे हैं—जब पूर्ण बहुमत की सरकार थी, तब समाधान क्यों नहीं निकला? क्यों चार साल तक “राजस्व गांव” का राग अलापा गया, क्यों जमीन पर कोई फैसला नहीं उतरा?
चुनाव आया, तो बदली दिशा
जैसे ही चुनाव नजदीक आए, बिंदुखत्ता का मुद्दा फिर से तेज हो गया। लेकिन इस बार रास्ता बदल गया—अब बात केंद्र की ओर मोड़ दी गई। सियासी जानकार इसे “जिम्मेदारी शिफ्ट” करने की रणनीति मान रहे हैं, ताकि चुनावी दबाव को कम किया जा सके।
जनता का दर्द: वादा नहीं, हक चाहिए
बिंदुखत्ता के लोगों के लिए यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व का सवाल है। पीढ़ियां बीत गईं, लेकिन जमीन का मालिकाना हक अब भी कागजों में कैद है। लोगों का कहना है—अब वादों से भरोसा नहीं बनता, हक चाहिए… और वो भी अब।
अब आहट आंदोलन की
स्थानीय स्तर पर चर्चाएं तेज हैं कि अगर इस बार भी समाधान नहीं निकला, तो आंदोलन तेज हो सकता है। “हर बार भरोसा, हर बार इंतजार” का सिलसिला अब टूटने की कगार पर है।अंतिम सवाल: भरोसा जिंदा रहेगा या टूट जाएगा?
चार साल तक वादों की बंसी बजती रही, और अब जब जवाब देने का वक्त आया, तो सुई केंद्र की ओर घूम गई।
बिंदुखत्ता की जनता एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी है—जहां भरोसा करना उसकी मजबूरी है… लेकिन इस बार इंतजार के साथ गुस्सा भी है।
अब देखना यह है कि यह कहानी फिर वादों में सिमटती है… या सच में जमीन पर उतरती है।
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