हल्दूचौड़ : गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों और माता जी की शहादत को याद करते हुए रक्तदान शिविर का आयोजन
रक्तदान जैसे पुण्य कार्य में जी जान से जुटी हुई जनहितकारी संस्था श्री दशमेश कृपा सेवक जत्था द्वारा आज प्राथमिक पाठशाला हल्दूचौड़ मैं सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी के चार साहिबजादे व माता जी की शहीदी को याद करते हुए रक्तदान शिविर का आयोजन किया।

दशम पिता के चार साहिबजादे बाबा अजीत सिंह, बाबा जुझार सिंह, बाबा जोरावर सिंह व बाबा फतेह सिंह व माता गुजरी कौर जी के शहीदी दिवस को समर्पित इस रक्तदान शिविर में 5 महिलाओं वह 51 पुरुषों द्वारा 56 यूनिट रक्तदान किया गया।

बताते चलें कि श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने जब श्री आनंदपुर किला छोड़ा तो उनका परिवार सिरसा नदी पर बिछुड़ गया। बड़े दो साहिबजादे गुरु जी के साथ रह गए और छोटे दो साहिबजादे माता गुजरी के साथ रह गए। बड़े साहिबजादे मुगलों के साथ हुए चमकौर साहिब में जंग के दौरान शहीद हो गए थे।
छोटे साहिबजादों को दीवार में चिनवा दिया था
1705 में मुगलों ने श्री गुरु गोबिंद सिंह के छोटे साहिबजादे 9 साल के बाबा जोरावर सिंह और 7 साल के बाबा फतेह सिंह के साथ माता गुजरी को गांव सहेड़ी के पास पकड़ कर उन्हें फतेहगढ़ साहिब ले जाया गया और वहां इस्लाम कबूल करने के लिए कहा गया, लेकिन साहिबजादे ने मना कर दिया। इस पर माता गुजरी और दोनों साहिबजादों को मुगलों ने यातना देने के लिए तीन दिन और दो रातें ठंडे बुर्ज में रखा था। साहिबजादों को दीवारों में चिनवा कर शहीद करने के बाद माता गुजरी ने भी प्राण त्याग दिए थे।
टोडरमल ने सोने की मोहरों से जगह खरीदी
इसके बाद साहिबजादों और माता गुजरी जी के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए मुगल कोई स्थान नहीं दे रहे थे। इस पर दीवान टोडरमल ने मुगलों से इनके संस्कार के लिए जगह मांगी तो उन्होंने सोने की मोहरें बिछाकर जमीन देने पर हामी भरी। इस पर दीवान टोडरमल ने हजारों सोने की मोहरों को बिछाकर दुनियां की सबसे कीमती जमीन खरीदी और तीनों का संस्कार फतेहगढ़ साहिब में किया था।
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