आधार लिंक ने बच्चों से छीनी सर्दी की सुरक्षा ! कड़ाके की ठंड में नंगे पांव स्कूल जाने को मजबूर बच्चे, 50 फीसदी छात्रों को नहीं मिले जूते-बैग के पैसे

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राजू अनेजा,काशीपुर। एक ओर सरकार बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सुविधाएं देने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर जिले के सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ कड़ाके की सर्दी से जूझने को मजबूर हैं। आधार लिंक न होने या अभिभावकों के बैंक खाते अपडेट न होने के कारण जूते और बैग के लिए भेजी गई डीबीटी राशि अब तक हजारों बच्चों तक नहीं पहुंच सकी है। हालात ऐसे हैं कि बच्चे पुराने, फटे जूते या चप्पल पहनकर स्कूल आ रहे हैं।
जिले में कक्षा एक से आठ तक के कुल 90,691 विद्यार्थियों के खातों में सितंबर माह में 3.45 करोड़ रुपये डीबीटी के माध्यम से भेजे गए थे। प्रत्येक विद्यार्थी को बैग के लिए 165 रुपये और जूते के लिए 153 रुपये की राशि दी गई। लेकिन खातों के लिंक न होने की वजह से करीब 50 फीसदी बच्चों को अब तक इस योजना का लाभ नहीं मिल पाया।
रुद्रपुर के राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय खेड़ा में कक्षा एक से आठ तक 239 विद्यार्थी पंजीकृत हैं। मंगलवार को यहां सिर्फ 155 बच्चे उपस्थित मिले, जबकि प्रधानाध्यापक दीप्ती जोशी गैरहाजिर रहीं। चौंकाने वाली बात यह है कि इस विद्यालय के 111 बच्चों को 10 महीने बीत जाने के बाद भी जूते और बैग का पैसा नहीं मिल सका।
इसी तरह राजकीय प्राथमिक विद्यालय रुद्रपुर में 143 छात्रों में से 73 बच्चे अब भी डीबीटी से वंचित हैं।
डीबीटी नहीं, मनमानी वितरण!
मामला यहीं खत्म नहीं होता। राजकीय प्राथमिक विद्यालय गंगापुर में शासनादेश को दरकिनार करते हुए प्रधानाध्यापक ने बच्चों के खातों में डीबीटी भेजने के बजाय ग्राम प्रधान के साथ मिलकर आधे बच्चों को ही जूते-बैग खरीदकर बांट दिए। नतीजा यह रहा कि आधे से ज्यादा बच्चे सुविधा से वंचित रह गए।
कक्षा तीन के छात्र करन ने बताया कि जिस दिन जूते-बैग बांटे गए, उस दिन वह स्कूल नहीं आ पाया, इसलिए उसे कुछ भी नहीं मिला।
विभाग का दावा, जमीनी हकीकत अलग
इस पूरे मामले पर डीईओ हरेंद्र कुमार मिश्रा का कहना है—
“ऐसी कोई शिकायत नहीं आई है। विभाग की ओर से स्कूलों में पैसा भेजा जा चुका है। अगर विद्यालय स्तर पर कोई समस्या है तो उसका समाधान कराया जाएगा।”
लेकिन सवाल यह है कि जब 10 महीने बाद भी सैकड़ों बच्चे नंगे पांव स्कूल जाने को मजबूर हैं, तो जिम्मेदारी आखिर किसकी है? कागजों में भेजी गई राशि और जमीन पर जूझते बच्चों की सर्द हकीकत, सिस्टम की बड़ी नाकामी को उजागर कर रही है।

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