रुद्रपुर में आखिर यह कैसी सियासत ! कभी ‘कठमुल्ला’ तो कभी ‘मुल्ला’… सुर्खियों की सियासत में शब्दों की मर्यादा क्यों भूले नेता?

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राजू अनेजा, रुद्रपुर।कभी शांतिप्रिय और सौहार्द के लिए पहचाने जाने वाले उत्तराखंड में सियासत का रंग अब तल्ख होता जा रहा है। राजनीतिक विरोध और आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन जब राजनीतिक मंचों से ऐसे शब्दों का इस्तेमाल होने लगे, जो किसी धर्म या समुदाय की पहचान से जुड़े हों, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर नेता जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं?

रुद्रपुर में बीते दिनों से सियासी बयानबाजी इसी वजह से चर्चा में है। 12 वफात के जुलूस के दौरान एक मौलवी की कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद रुद्रपुर विधायक द्वारा प्रतिक्रिया में ‘कठमुल्ला’ जैसे शब्द का इस्तेमाल चर्चा में आया। मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि कांग्रेस के प्रदर्शन के विरोध में भाजपा के प्रदर्शन के दौरान रुद्रपुर के मेयर द्वारा ‘मुल्ला’ शब्द का इस्तेमाल किए जाने की बात भी सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गई।

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सवाल यह नहीं है कि कौन भाजपा का है और कौन कांग्रेस का। सवाल यह है कि क्या राजनीतिक विरोध जताने के लिए धार्मिक पहचान से जुड़े शब्दों को हथियार बनाया जाना जरूरी है?

 

विरोध होना लाजमी, लेकिन शब्दों की सीमा में

राजनीति में एक-दूसरे पर कटाक्ष होना कोई नई बात नहीं है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना, विपक्ष को घेरना और तीखे राजनीतिक हमले करना लोकतंत्र की खूबसूरती भी है। मगर व्यक्तिगत या राजनीतिक विरोध को धर्म और मजहब से जोड़ देना कहीं न कहीं बहस की दिशा बदल देता है।

बड़े संवैधानिक और राजनीतिक पदों पर बैठे नेताओं से जनता अपेक्षा करती है कि वे अपने शब्दों से समाज को जोड़ने का काम करेंगे, न कि ऐसी भाषा को बढ़ावा देंगे जिससे सामाजिक खाई चौड़ी हो।

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सुर्खियां बटोरने की होड़ में मर्यादा न हो तार-तार

 

रुद्रपुर की राजनीति में जिस तरह बयानबाजी लगातार तीखी होती जा रही है, उससे एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—क्या सुर्खियों में बने रहने के लिए राजनीतिक भाषा का स्तर इतना नीचे जाना जरूरी है?

नेताओं के पास अपनी बात रखने के लिए शब्दों की कोई कमी नहीं है। विपक्ष की नीतियों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, नेताओं के कामकाज पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं और राजनीतिक फैसलों की आलोचना भी खुलकर की जा सकती है। लेकिन किसी धर्म की पहचान से जुड़े शब्दों को राजनीतिक कटाक्ष का हिस्सा बनाना निश्चित तौर पर बहस को दूसरी दिशा में ले जाता है।

देवभूमि में सियासत हो, मगर सौहार्द के साथ

 

उत्तराखंड की पहचान केवल पहाड़, नदियों और देवभूमि के नाम से नहीं, बल्कि यहां के सामाजिक सौहार्द और आपसी भाईचारे से भी है। ऐसे में राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे अपने बयानों में संयम बरतें।

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किसी नेता को किसी की धार्मिक पहचान पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं होना चाहिए—चाहे वह सत्ता पक्ष में हो या विपक्ष में। राजनीति में तल्खी रहे, सवाल हों, आरोप हों, प्रत्यारोप हों, लेकिन भाषा ऐसी हो जो लोकतंत्र की गरिमा बढ़ाए।

आखिर जनता भी यही देख रही है कि नेता मुद्दों पर लड़ रहे हैं या फिर शब्दों के जरिए समाज को बांटने की राजनीति कर रहे हैं।

 

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