उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा मोड़; सात बार के विधायक बंशीधर भगत नहीं लड़ना चाहते आगामी चुनाव, बेटे विकास भगत के लिए मांगी टिकट
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और सरकार में कई बार मंत्री रह चुके बंशीधर भगत ने आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। राज्य में चुनावी सुगबुगाहट और टिकट के लिए तेज होती दावेदारी के बीच उनके इस बयान ने कालाढूंगी विधानसभा सीट पर नए राजनीतिक समीकरणों को जन्म दे दिया है। भगत अब अपनी राजनीतिक विरासत अगली पीढ़ी यानी अपने बेटे को सौंपने की तैयारी में हैं।
राजनीतिक विरासत बेटे विकास भगत को सौंपने की इच्छा
करीब पांच दशक से सक्रिय राजनीति का हिस्सा रहे सात बार के विधायक बंशीधर भगत ने हाईकमान के समक्ष खुद चुनाव न लड़ने की इच्छा जताई है। उनका कहना है कि वे अपनी जगह किसी अन्य योग्य और लोकप्रिय चेहरे को देखना चाहते हैं। भगत ने अपने बेटे और भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता विकास भगत के लिए टिकट की पैरवी करते हुए कहा है कि आज क्षेत्र में उनके बेटे की लोकप्रियता और सक्रियता उनकी तुलना में कहीं अधिक है। उन्होंने विश्वास जताया कि यदि पार्टी उनके बेटे को मौका देती है, तो वह उनसे भी अधिक वोटों से जीत दर्ज कर विधानसभा पहुंचेगा। हालांकि, इस पर अंतिम निर्णय पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व ही करेगा।
लंबा और प्रभावशाली रहा है बंशीधर भगत का राजनीतिक सफर
वर्ष 1949 में जन्मे बंशीधर भगत का राजनीतिक करियर बेहद लंबा और संघर्षपूर्ण रहा है। उन्होंने वर्ष 1975 में जनसंघ से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। इसके बाद वर्ष 1991 में वे पहली बार नैनीताल सीट से विधायक चुने गए और 1993 तथा 1996 में भी इसी सीट से विजयी रहे। वर्ष 2002 में हल्द्वानी सीट से हार का सामना करने के बाद उन्होंने 2007 में शानदार वापसी की और हल्द्वानी से जीते। इसके पश्चात 2012, 2017 और 2022 के चुनावों में उन्होंने कालाढूंगी सीट से लगातार जीत हासिल कर कुल सात बार विधायक बनने का गौरव प्राप्त किया।
अपने राजनीतिक सफर के दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड सरकार में विभिन्न महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2020 में उन्हें उत्तराखंड भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष भी नियुक्त किया गया था। अब इतने लंबे और प्रभावशाली राजनीतिक करियर के बाद उनका खुद चुनावी मैदान से हटने का निर्णय लेना उत्तराखंड की सियासत में चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ है।

