बेरहम पूस की रात के आगे मेयर की दरियादिली भी न आई काम ,निकम्मी औलाद की बेरुखी से बुझ गई बुजुर्ग की सांस

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राजू अनेजा, रुद्रपुर।जिस घर में कभी बुजुर्ग की मौजूदगी सम्मान मानी जाती थी, उसी घर ने पूस की कड़कड़ाती ठंड में उसे बाहर फेंक दिया। अपनों की बेदर्दी और सर्द रातों की मार ने आखिरकार 75 वर्षीय बुजुर्ग की जान ले ली। पूस का महीना विदा हुआ, तो बुजुर्ग भी इस दुनिया को अलविदा कह गए।
मूल रूप से बलिया (उत्तर प्रदेश) निवासी बुजुर्ग ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पढ़ाने-लिखाने, उन्हें काबिल बनाने और अपने पैरों पर खड़ा करने में गुजार दी। बुढ़ापे में यही आस थी कि बेटे सहारा बनेंगे, लेकिन रुद्रपुर की वसुंधरा कॉलोनी में वही बेटे उनके लिए सबसे बड़े जालिम साबित हुए।

25 दिसंबर: जब बाप घर में नहीं, गैलरी में पड़ा मिला

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पूस की सर्द रात 25 दिसंबर को बेटे और परिजनों ने बुजुर्ग पिता को कमरे से निकालकर गैलरी में रखे तख्त पर सुला दिया। न रजाई, न लिहाफ—बस नाममात्र का बिस्तर। पूरी रात बुजुर्ग ठंड से कांपते रहे, लेकिन घर के भीतर सो रहे लोगों की नींद पर कोई असर नहीं पड़ा।
इस अमानवीय हरकत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो हड़कंप मच गया। सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची। मेयर विकास शर्मा भी वीडियो देखकर तुरंत घर पहुंचे। उन्होंने बुजुर्ग को अंदर भिजवाया और वृद्धाश्रम भेजने की बात कही, तब कहीं जाकर बेटे का दिल पसीजा।

मेयर विकास शर्मा ने कहा,
“यह घटना इंसानियत पर करारा तमाचा है। बुजुर्ग को ठंड में बाहर सुलाया जाना पूरे समाज के लिए शर्मनाक है।”

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पूस की आखिरी रात बनी जिंदगी की आखिरी रात

तीन जनवरी की रात पूस ने आखिरी सांस ली और उसी के साथ बुजुर्ग की जिंदगी भी थम गई। चार जनवरी, रविवार को पूर्वाह्न करीब 11 बजे उन्होंने दम तोड़ दिया। दिल में टीस लिए उनकी अर्थी उठी और परिजन बिना पोस्टमार्टम कराए शव को गांव बलिया ले गए।

 

न सूचना, न पोस्टमार्टम—अब हर एंगल से जांच

पुलिस अधिकारियों के अनुसार बुजुर्ग की मौत की सूचना समय पर नहीं दी गई। परिजन बिना पोस्टमार्टम कराए शव ले गए। ट्रांजिट कैंप थाना पुलिस ने कॉलोनी पहुंचकर पड़ोसियों से पूछताछ की।

एसएसपी मणिकांत मिश्रा ने कहा,
“मामले की जांच की जा रही है। परिजनों से संपर्क कर सभी तथ्यों की जानकारी जुटाई जाएगी।”
पड़ोसियों का कहना है कि बुजुर्ग कई दिनों से घर के बाहर सोने को मजबूर थे। ठंड या हार्ट अटैक से मौत की आशंका जताई जा रही है। वहीं बेटा मिर्गी के दौरे पड़ने की बात कहकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहा है।

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सवाल वही—बाप बोझ कब बना?

यह सिर्फ एक बुजुर्ग की मौत नहीं, बल्कि उस सोच की मौत है जहां औलादें अपने ही बाप को पूस की रात में बाहर सुला देती हैं… और फिर खामोशी से उसका अंतिम संस्कार कर देती हैं।

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