हाईकोर्ट के आदेश का पालन करना, क्या पुलिस के लिए बन गया जी का जंजाल !

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नैनीताल।आज पूरे प्रदेश में उत्तराखंड मित्र पुलिस जो अपने कर्तव्यों के लिए जानी जाती है, एक दुखद घटना के कारण वही खाकी कटघरे में खड़ी है वो भी सिर्फ इसलिए क्युंकी उच्च न्यायालय हाईकोर्ट का आदेश रिट याचिका नo डब्ल्यूपीसीआरएल 1534/2025 में दिनांक 25/11/25 को पुलिस को आदेश देते हुए कहा की प्रथम पक्ष अमरजीत सिंह आदि बनाम सरकार व आदि में प्रथम पक्ष को प्रोटेक्शन प्रदान करते हुए एस एच ओ काशीपुर को निर्देशित किया गया । जनपद ऊधम सिंह नगर की खाकी कोर्ट के आदेश का पालन कर रही थी उससे क्या पता था को एक दिन ऐसा आएगा की वो ख़ुद ही आरोपों के कटघरे में खड़ी हो जाएगी । दोनों पक्ष खाकी पर और जनपद के आला अधिकारियों पर एक के बाद एक दबाव बना अपने पक्ष में कार्य करना चाहते थे लेकिन पुलिस कोर्ट के आदेश से बंधी हुई थी, और कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्य कर रही थी ।
खाकी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि दो लोगो के लेन देन का मामला उनके गले की फांस बन जाएगा। आपको बताते चले की सुखवंत सिंह ( मृतक) ने जिस दूसरे पक्ष आशीष चौहान और उसके साथियों पर आरोप लगाए हैं, उनको हाईकोर्ट ने प्रोटेक्शन प्रदान कर रखी थी जिसका अनुपालन पुलिस द्वारा किया जा रहा था । यह सर्व विदित है कि कोई भी निर्देश / आदेश न्यायालय द्वारा पुलिस को दिया जाता है तो उसका पालन करना उसका दायित्व बन जाता है। अब यहाँ एक सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है, क्या खाकी को कोर्ट के आदेश को नहीं मानना चाहिए था ?
दूसरे पक्ष की बात को मान, आशीष चौहान और उसके साथियों पर हाईकोर्ट के आदेश होने के बाद ही कार्यवाही कर देनी चाहिये थी ? जिस मणिकांत मिश्रा ने अपराधियों को कानून का पाठ पढ़ा जनपद को अपराध मुक्त बनाया आज उसको एक अपराधी की तरह दिखाना सही है ? वह भी बिना जाँच और ठोस सबूत के ! यहाँ पर गौर करने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि अगर खाकी कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करती तो क्या करती ? तो क्या खाकी अपने ऊपर कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट करा लेती ? सिर्फ इसलिए की दूसरा पक्ष ख़ुश हो जाए ? किसी का इस तरह मृत्यु को गले लगाना और चले जाना बेहद दुखदाई है और हमारी उस परिवार से पूरी सहानुभूति है, लेकिन ये देश क़ानून और संविधान से चलता है और उसका पालन हर एक नागरिक को करना पड़ता है भले फिर वो एक आम इंसान हो या एक पुलिस कर्मी या एक आई पी एस अधिकारी । जब कोई मामला कोर्ट में पहुँच जाता है तो उसमे किसी व्यक्ति विशेष की नहीं चलती बल्कि ऐसे में कोर्ट के आदेश का पालन करना होता हैं । कितनी हैरानी वाली बात है की जिस मणिकांत के जनपद को अपराध मुक्त बनाने के लिए न दिन देखा न रात, आवाम को अपना परिवार माना और एक जिम्मेदार परिवार का मुखिया होने के नाते अपराधियों से सीधा मुक़ाबला किया, जिसका गुणगान अक्सर मीडिआ और सोशल मीडिआ प्लेटफार्म पर समय समय पर होता रहा है , आज वही मणिकांत कुछ लोगों की आंखो में चुभ रहा है। अब सवाल ये भी खड़ा होता है कि क्या सही में मणिकांत दोषी है या अपनों को ख़ुश करने के लिए एक ईमानदार अधिकारी को दोषी ठहराया जा रहा है ? इस पर हम सब को अंतर्मन से समीक्षा कर फैसला करना होगा ।

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