टिहरी/नई दिल्ली: उत्तराखंड के बहुचर्चित ‘गुमाल गांव तिहरे हत्याकांड’ में अपर सत्र न्यायाधीश नसीम अहमद की अदालत ने अभियुक्त संजय सिंह को सुनाई गई फांसी की सजा को बरकरार रखा है। नैनीताल हाईकोर्ट के निर्देश पर दोबारा हुए ट्रायल और मेडिकल फिटनेस की गहन जांच के बाद कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि अभियुक्त का कृत्य किसी भी रियायत के योग्य नहीं है।
क्या था रूह कंपा देने वाला मामला?
यह घटना 13 दिसंबर 2014 की है, जिसने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया था:
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शुरुआत: मामूली कहासुनी के बाद अभियुक्त संजय सिंह ने आपा खो दिया।
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पहला कत्ल: वह तलवार लेकर जंगल पहुँचा और वहां अपनी गर्भवती भाभी कांता देवी की निर्मम हत्या कर दी।
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तांडव: इसके बाद वह घर लौटा और वहां अपने भाई सुरेंद्र सिंह और अपनी सगी मां मीना देवी को भी तलवार से काट डाला।
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पिता की जान: वह अपने पिता राम सिंह की भी हत्या करना चाहता था, लेकिन उस वक्त वे बाजार गए हुए थे। बाद में सदमे के कारण पिता की भी 2 महीने बाद मौत हो गई।
पुलिस और अदालती कार्यवाही का सफर
घटना के बाद अभियुक्त ने खुद को बंदूक के साथ कमरे में बंद कर लिया था, जिसे पुलिस ने आंसू गैस छोड़कर गिरफ्तार किया।
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पहला फैसला (2021): 24 अगस्त 2021 को इसी कोर्ट ने संजय को फांसी की सजा सुनाई थी।
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हाईकोर्ट का दखल: फांसी की पुष्टि (Confirmation) के लिए मामला नैनीताल हाईकोर्ट गया, जहाँ कोर्ट ने तकनीकी आधारों और अभियुक्त के मानसिक स्वास्थ्य की जांच के लिए निचली अदालत को पुनः ट्रायल (Retrial) का आदेश दिया।
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ताजा फैसला (2026): अपर सत्र न्यायाधीश नसीम अहमद की कोर्ट ने सभी गवाहों, साक्ष्यों और चिकित्सकों की ‘फिट फॉर ट्रायल’ (मानसिक रूप से स्वस्थ) रिपोर्ट के आधार पर फिर से मृत्युदंड और ₹10,000 अर्थदंड की सजा सुनाई।
मानसिक फिटनेस बनी सजा का आधार
एडीजीसी (ADGC) बेणीमाधव शाह के अनुसार, अभियुक्त ने बचाव के लिए अपनी मानसिक स्थिति का सहारा लेने की कोशिश की थी। लेकिन:
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मेडिकल परीक्षण में डॉक्टरों ने उसे ट्रायल के लिए फिट पाया।
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अभियोजन पक्ष ने 4 मई 2023 को सभी पुख्ता साक्ष्य कोर्ट के सामने रखे।
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कोर्ट ने माना कि अपराध का तरीका इतना वीभत्स था कि यह ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ (दुर्लभतम में से दुर्लभ) की श्रेणी में आता है।
केस टाइमलाइन एक नजर में (Case Timeline)
| तिथि | घटनाक्रम |
| 13 दिसंबर 2014 | तिहरा हत्याकांड (मां, भाई और गर्भवती भाभी की हत्या)। |
| 24 अगस्त 2021 | निचली अदालत ने पहली बार फांसी की सजा सुनाई। |
| 10 मई 2022 | हाईकोर्ट ने फैसले को अपास्त कर दोबारा सुनवाई के निर्देश दिए। |
| 20 फरवरी 2026 | कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा। |
| 25 फरवरी 2026 | अदालत ने फांसी की सजा को दोबारा बरकरार रखा। |
न्याय की जीत: स्थानीय लोगों और कानून के जानकारों का मानना है कि इस तरह के जघन्य अपराधों में मृत्युदंड ही एकमात्र न्याय है, जो समाज में कड़ा संदेश देता है।

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