
राजू अनेजा,लालकुआ।लालकुआं विधानसभा सीट पर कांग्रेस बीते 15 सालों से सत्ता की दहलीज तक पहुंचने को बेताब है, लेकिन हर चुनाव में जीत का स्वाद उसके लिए सपना ही बना रहा। बड़े चेहरे उतारे गए, मुद्दों की लंबी फेहरिस्त गिनाई गई, सत्ता विरोधी माहौल भी बना—फिर भी कांग्रेस का राजनीतिक वनवास खत्म नहीं हो सका। अब एक बार फिर चुनावी सरगर्मी तेज है और वही सवाल जनता के बीच गूंज रहा है—क्या इस बार लालकुआं में कांग्रेस का 15 साल पुराना वनवास टूटेगा या फिर इतिहास खुद को दोहराएगा?
आपको बताते चले कि लालकुआं विधानसभा सीट पर कांग्रेस बीते डेढ़ दशक से सत्ता की दहलीज तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रही है। कभी मजबूत जनाधार, कभी बड़े चेहरों की मौजूदगी, तो कभी सत्ता विरोधी माहौल—सब कुछ होने के बावजूद कांग्रेस जीत की रेखा पार नहीं कर सकी।
2012: बगावत ने बदला चुनावी गणित
साल 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की अंदरूनी कलह खुलकर सामने आई। पूर्व कैबिनेट मंत्री हरिश्चंद्र दुर्गा पाल को कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया, नतीजतन उन्होंने निर्दलीय मैदान में उतरकर चुनावी समर को रोचक बना दिया। उस चुनाव ने साफ कर दिया कि लालकुआं में चेहरा और जनसंपर्क पार्टी से भी भारी पड़ सकता है। हालांकि इस दौरान हरिश्चंद्र दुर्गा पाल ससम्मान कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए थे।
2016/2017: भाजपा की मजबूत दस्तक
इसके बाद हुए चुनाव में भाजपा उम्मीदवार नवीन दुमका ने कांग्रेस के प्रत्याशी पूर्व कैबिनेट मंत्री हरिश्चंद्र दुर्गा पाल को पराजित कर भाजपा के लिए सीट मजबूत की। यहीं से लालकुआं में भाजपा की पकड़ और गहरी होती चली गई।
2022: बड़ा चेहरा भी नहीं दिला सका जीत
2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपना सबसे बड़ा दांव खेला। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को मैदान में उतारा गया, लेकिन भाजपा के मोहन सिंह बिष्ट ने उन्हें भी शिकस्त देकर यह संदेश दे दिया कि सिर्फ बड़ा नाम ही जीत की गारंटी नहीं होता।
मुद्दे वही, चुनाव दर चुनाव दोहराव
पिछले 10 वर्षों पर नजर डालें तो भाजपा ने विकास, सड़क, रोजगार, बिंदुखत्ता राजस्व गांव, लाल कुआं मालिकाना हक सहित बुनियादी सुविधाओं जैसे तमाम स्थानीय मुद्दों को चुनावी हथियार बनाया। जनता ने इन मुद्दों पर भरोसा कर भाजपा को विधानसभा तक पहुंचाया, लेकिन हकीकत यह है कि कई समस्याएं आज भी जस की तस हैं। चुनाव आता है, मुद्दे गरमाते हैं और चुनाव गुजरते ही फाइलों में सिमट जाते हैं।
कांग्रेस के सामने बड़ा मौका या आखिरी इम्तिहान?
ऐसे में सवाल यह है कि सत्ता विरोधी माहौल, अधूरे वादों और स्थानीय असंतोष को भुनाने में कांग्रेस कितनी सफल होगी? क्या कांग्रेस इस बार सिर्फ चेहरों की नहीं, बल्कि जमीनी मुद्दों की लड़ाई लड़ेगी? या फिर संगठनात्मक कमजोरी और आपसी खींचतान एक बार फिर उसकी राह रोक देगी?
लालकुआं विधानसभा में कांग्रेस की वापसी आसान नहीं, लेकिन असंभव भी नहीं है। जनता अब वादों से नहीं, काम के ठोस जवाब चाहती है। अगर कांग्रेस इस नब्ज को पकड़ पाई, तो 15 साल की जद्दोजहद खत्म हो सकती है। वरना सवाल वही रहेगा—कांग्रेस की वापसी कब?
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