एक अदद छत इन मासूमों को भी दे दो साहब! जर्जर छत के नीचे 140 मासूम गढ़ रहे देश का भविष्य

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महुआखेड़ागंज के प्राथमिक विद्यालय में हर पल हादसे का खतरा, दो कमरे बंद तो तीन की छत से झड़ रहा प्लास्टर; बारिश में बरामदे में बैठकर पढ़ने को मजबूर नौनिहाल

 

मरम्मत और नए भवन के प्रस्ताव फाइलों में अटके, आखिर कब मिलेगी बच्चों को सुरक्षित छत?

राजू अनेजा, काशीपुर।किसी के सिर पर छत न हो तो वह खुले आसमान के नीचे जिंदगी गुजारने को मजबूर होता है, लेकिन महुआखेड़ागंज के इन मासूमों का दर्द इससे भी अलग है। इनके सिर पर छत तो है, मगर वह सुरक्षित नहीं। जिस छत के नीचे बैठकर इन्हें अक्षर ज्ञान हासिल करना है, वही छत कभी भी इनके लिए खतरा बन सकती है। हाथों में किताबें, आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने और सिर के ऊपर जर्जर भवन का साया। यह तस्वीर है राजकीय प्राथमिक विद्यालय महुआखेड़ागंज की, जहां 140 नौनिहाल जोखिम के बीच देश का भविष्य गढ़ने में जुटे हैं। विद्यालय भवन की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि खतरे को देखते हुए दो कमरों को बंद करना पड़ा है, जबकि पढ़ाई के लिए इस्तेमाल हो रहे पांच कमरों में से तीन की छतों का प्लास्टर भी उखड़कर गिर रहा है। सवाल यह है कि आखिर इन बच्चों को सुरक्षित छत देने के लिए जिम्मेदार विभाग किसी बड़े हादसे का इंतजार क्यों कर रहा है?

 

दो कमरों पर लटके ताले, बाकी तीन में भी सिर पर मंडराता खतरा

विद्यालय कभी सात कमरों में संचालित होता था। समय के साथ देखरेख और मरम्मत के अभाव में भवन की हालत बिगड़ती चली गई। दो कमरों की छतों का प्लास्टर उखड़ने लगा और दीवारों में दरारें पड़ गईं। बरामदे की छत भी बदहाल हो गई। बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए इन दोनों कमरों को बंद करना पड़ा। लेकिन विडंबना यह है कि जिन पांच कमरों में बच्चों को बैठाया जा रहा है, उनकी हालत भी संतोषजनक नहीं है। इनमें से तीन कमरों की छतों से प्लास्टर उखड़ रहा है। सीलन के कारण छतें कमजोर हो रही हैं और बच्चों के ऊपर खतरे का साया लगातार बना हुआ है।

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बारिश होते ही बदल जाती है पाठशाला, कमरों से निकलकर बरामदे में बैठते हैं बच्चे

बारिश का मौसम विद्यालय के बच्चों और शिक्षकों के लिए एक अलग मुसीबत लेकर आता है। तीन कमरों की छतों से पानी टपकने लगता है। ऐसे में बच्चों को कमरों में बैठाना मुश्किल हो जाता है और उन्हें बरामदे में बैठाकर पढ़ाई करानी पड़ती है। यानी जिन कमरों में बच्चों को सुरक्षित बैठकर शिक्षा हासिल करनी चाहिए, बारिश के दौरान वही कमरे उनके लिए परेशानी का कारण बन जाते हैं। छत से टपकता पानी, सीलन और उखड़ता प्लास्टर विद्यालय की बदहाली की कहानी खुद बयां कर रहे हैं।

 

140 बच्चों पर पांच कमरे, जगह की कमी से पढ़ाई भी प्रभावित

विद्यालय में वर्तमान में करीब 140 बच्चे अध्ययनरत हैं। सात कमरों वाले विद्यालय में दो कमरे बंद होने के कारण अब पांच कमरों में ही शिक्षण कार्य संचालित किया जा रहा है। विद्यार्थियों की संख्या के मुकाबले कमरों की उपलब्धता कम होने से बैठने की व्यवस्था में भी परेशानी होती है। ऐसे में बच्चों की सुरक्षा के साथ-साथ उनकी पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है। सवाल उठता है कि सरकारी विद्यालयों में बेहतर शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के दावों के बीच इन बच्चों को आखिर ऐसी बदहाल व्यवस्था में पढ़ने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ रहा है?

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कई बार भेजे गए प्रस्ताव, लेकिन सुरक्षित भवन का इंतजार बरकरार

विद्यालय की जर्जर हालत से विभागीय अधिकारी अनजान नहीं हैं। विद्यालय की मरम्मत और नए भवन के निर्माण के लिए कई बार प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं। इसके बावजूद अब तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका है। दो कमरे बंद हैं, तीन की छतों से प्लास्टर उखड़ रहा है और 140 बच्चों की पढ़ाई पांच कमरों के भरोसे चल रही है। इसके बाद भी भवन की मरम्मत और निर्माण की प्रक्रिया स्वीकृति के इंतजार में है। सवाल यह है कि जब विद्यालय की बदहाली सामने है तो बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए तात्कालिक इंतजाम क्यों नहीं किए जा रहे?

 

प्रधानाध्यापक बोले- सात में से दो कमरे बंद, तीन की छत से टपकता है पानी

राजकीय प्राथमिक विद्यालय महुआखेड़ागंज के प्रधानाध्यापक राजेंद्र सिंह ने बताया कि विद्यालय में कुल सात कक्ष हैं। दुर्घटना की आशंका को देखते हुए दो कक्ष बंद कर दिए गए हैं। तीन अन्य कक्षों की छतों से बारिश के दौरान पानी टपकता है। ऐसे में बच्चों को बरामदे में बैठाना पड़ता है। कक्षों की मरम्मत और नए भवन निर्माण के प्रस्ताव कई बार भेजे जा चुके हैं।

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स्वीकृति मिलने पर होगी मरम्मत : खंड शिक्षा अधिकारी

खंड शिक्षा अधिकारी काशीपुर धीरेंद्र कुमार साहू ने बताया कि राजकीय प्राथमिक विद्यालय महुआखेड़ागंज के जर्जर भवन को लेकर विद्यालय से प्राप्त प्रस्ताव उच्चाधिकारियों को भेजे गए हैं। स्वीकृति मिलने पर भवन की मरम्मत कराई जाएगी।

 

बड़ा सवाल : क्या बच्चों की सुरक्षा के लिए हादसे का इंतजार है?

महुआखेड़ागंज के इस विद्यालय की हालत सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा करती है। जिन बच्चों को सुरक्षित माहौल में शिक्षा मिलनी चाहिए, वे जर्जर छतों के नीचे बैठकर भविष्य संवारने को मजबूर हैं। दो कमरे पहले ही बंद किए जा चुके हैं और तीन अन्य कमरों की छतों से प्लास्टर उखड़ रहा है। ऐसे में केवल प्रस्ताव भेज देना या स्वीकृति का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि जिम्मेदार अधिकारी तत्काल विद्यालय का निरीक्षण कर बच्चों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएं और भवन की मरम्मत अथवा नए निर्माण की प्रक्रिया को प्राथमिकता दें। आखिर ये 140 बच्चे भी इसी देश का भविष्य हैं। इन्हें भी सुरक्षित छत, सुरक्षित कक्षाएं और भयमुक्त वातावरण में पढ़ने का अधिकार है। साहब! इन मासूमों को भी एक सुरक्षित छत दे दीजिए, ताकि इनके सपनों पर जर्जर भवन का साया न पड़े।