राजू अनेजा,रुद्रपुर/किच्छा। राजनीति में कुछ दृश्य ऐसे होते हैं जो शब्दों से ज़्यादा अर्थ कहते हैं। किच्छा विधायक तिलकराज बेहड़ के जन्मदिन पर पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल द्वारा भेंट की गई तलवार भी ऐसा ही एक दृश्य बनकर उभरी है। यह तलवार केवल एक प्रतीकात्मक उपहार नहीं रही, बल्कि तराई की राजनीति में सियासी हलचल का संकेत बन गई है। सवाल यही है कि इस तलवार की धार आने वाले दिनों में किस ओर वार करेगी?
पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल के कांग्रेस में शामिल होने की अटकलें पहले से ही राजनीतिक गलियारों में तेज थीं। ऐसे में बेहड़ के जन्मदिन पर उनकी मौजूदगी और तलवार भेंट करने का यह घटनाक्रम साधारण नहीं माना जा रहा। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह तराई से 2027 विधानसभा चुनाव के शंखनाद जैसा है, जहां पुराने सियासी खिलाड़ी नए समीकरणों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं।
यदि हालिया इतिहास पर नजर डालें तो 2022 के विधानसभा चुनाव में तराई का मिजाज साफ तौर पर देखने को मिला था। उधम सिंह नगर जिले में कांग्रेस ने पूरी मजबूती के साथ चुनाव लड़ा और 9 में से 5 सीटों पर कब्जा जमाया था। भाजपा को महज 4 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। यही नहीं, खटीमा सीट से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को मिली हार ने प्रदेश की राजनीति को झकझोर कर रख दिया था। यह परिणाम साफ संकेत था कि तराई की राजनीति किसी एक दल की बपौती नहीं रही।
अब 2027 की ओर बढ़ते कदमों में वही तराई एक बार फिर सियासी रणभूमि बनती दिख रही है। कांग्रेस खेमे में ठुकराल जैसे प्रभावशाली चेहरे की संभावित एंट्री को बड़ी मजबूती के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं भाजपा के भीतर भी असंतोष की चिंगारियां सुलगती नजर आ रही हैं। गदरपुर से यदि भाजपा नेता अरविंद पांडे को टिकट नहीं मिलता है, तो उनके बगावती सुर अपनाने की संभावनाओं ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है।
राजनीति में संकेतों की भाषा अक्सर सीधी घोषणाओं से ज्यादा असरदार होती है। बेहड़ के जन्मदिन पर दी गई तलवार ने भी यही संदेश दिया है कि तराई की राजनीति अब नए मोड़ पर खड़ी है। यह मोड़ कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित होगा या भाजपा के लिए चुनौती, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इतना तय है कि 2027 की सियासी बिसात तराई से बिछनी शुरू हो चुकी है।
आज यह आयोजन एक जन्मदिन समारोह था, लेकिन इसके भीतर छुपे सियासी संदेश ने साफ कर दिया है कि आने वाले चुनाव की तैयारी अब सिर्फ कागजों में नहीं, बल्कि ज़मीन पर दिखाई देने लगी है। तराई से उठी यह सियासी आहट कहां तक पहुंचेगी, इसका जवाब आने वाला समय देगा, मगर फिलहाल इतना कहना गलत नहीं होगा कि बेहड़ के जन्मदिन ने 2027 की चुनावी जंग का बिगुल बजा दिया है।
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