52 साल की उम्र में पुराने सर्टिफिकेट देखकर ताजा हुईं बचपन और कॉलेज की यादें,
पेंटिंग से तलवारबाजी और फुटबॉल तक हासिल कीं उपलब्धियां; ससुर ने बेटी की तरह जिप्सी में घुमाया तो सास ने प्यार से सिखाया खाना बनाना
राजू अनेजा,काशीपुर। बहू मायके से क्या लाई है, यह पूछने के बजाय कभी उससे यह भी पूछिए कि उसके कितने सपने हैं और परिवार उन्हें पूरा करने में उसका कितना साथ दे सकता है। बहू को केवल घर की जिम्मेदारियों तक सीमित रखने के बजाय उसकी प्रतिभा और पहचान को निखारने का अवसर दीजिए। रिश्ते केवल अपेक्षाओं से नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान और अपनत्व से मजबूत होते हैं। यह भावनात्मक संदेश महापौर दीपक बाली की पत्नी उर्वशी बाली ने अपनी जिंदगी के अनुभव साझा करते हुए दिया है।
उर्वशी बाली ने अपने लेख में बताया कि हाल ही में 52 वर्ष की उम्र में अलमारी ठीक करते हुए सर्दियों के कपड़े निकाल रही थीं। इसी दौरान स्कूल और कॉलेज के पुराने प्रमाणपत्र हाथ लग गए। इन प्रमाणपत्रों को देखकर उन्हें अपना बीता हुआ समय याद आ गया। बेटी मुद्रा ने भी जब एक-एक प्रमाणपत्र देखा तो मां की उपलब्धियों को देखकर हैरानी और खुशी जताई।
पुराने प्रमाणपत्रों ने याद दिलाया कि कभी कला, खेल और पढ़ाई के क्षेत्र में कितने सपने देखे थे और उन्हें पूरा करने के लिए कितनी मेहनत की थी।
पेंटिंग से तलवारबाजी तक, उपलब्धियों से भरा रहा सफर
उर्वशी बाली ने अपने लेख में बताया कि वर्ष 1988 में भारत विकास परिषद की पेंटिंग प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार हासिल किया। वर्ष 1994 और 1995 में हरियाणा इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स की प्रतियोगिताओं में स्थान प्राप्त किया। वर्ष 1995 में प्रथम पुरस्कार के साथ कन्या महाविद्यालय, फतेहपुर पुंडरी में पॉट पेंटिंग और डेकोरेशन में भी प्रथम स्थान हासिल किया।
वर्ष 1996 में सोहन लाल डीएवी कॉलेज, अंबाला में स्थान प्राप्त किया। एसडी गर्ल्स हाई स्कूल में कढ़ाई और ड्रेस डिजाइनिंग में प्रथम पुरस्कार हासिल किया। हरियाणा जनसंपर्क विभाग के संस्कृत नृत्य कार्यक्रम में भी प्रथम स्थान प्राप्त किया।
खेलों में भी उनकी रुचि कम नहीं रही। वर्ष 1992 में राष्ट्रीय तलवारबाजी चैंपियनशिप में हिस्सा लिया। वर्ष 1993 में हरियाणा की पहली महिला क्रिकेट प्रतियोगिता में प्रतिभाग किया। वर्ष 1994 में छठी हरियाणा राज्य तलवारबाजी चैंपियनशिप में भी हिस्सा लिया।
उनके जीवन का एक खास पहलू यह भी रहा कि कर्ण पब्लिक स्कूल में सात वर्षों तक वह बॉयज फुटबॉल टीम में अकेली लड़की रहीं। लड़कों के साथ फुटबॉल खेलीं, प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और जूनियर बॉयज फुटबॉल कोच बनने का अवसर भी मिला। वर्ष 1995-96 में कॉलेज की अध्यक्ष भी रहीं।
शादी के बाद ससुराल ने नहीं छीनी आजादी, ससुर बने हमसफर
उर्वशी बाली ने अपने लेख में शादी के बाद के अनुभवों को विशेष रूप से साझा किया है। उन्होंने बताया कि उनके पिता आर्मी अधिकारी थे और उन्होंने उन्हें बेटों की तरह पाला था। पश्चिमी कपड़े पहनना, स्पोर्ट्स ड्रेस में रहना और खेलों में हिस्सा लेना उनकी जिंदगी का हिस्सा था।
शादी के बाद वह ऐसे परिवार में आईं जहां खेती-बाड़ी और पारंपरिक जीवनशैली का प्रभाव था, लेकिन उनके व्यक्तित्व और पसंद को लेकर कभी रोक-टोक नहीं हुई।
वह बताती हैं कि उनके ससुर स्वर्गीय रतन लाल बाली ने हमेशा पिता की तरह उनका साथ दिया। वह जिप्सी चलाती थीं तो ससुर जी उनके साथ बैठकर फार्म जाते, बाजार जाते, मंदिर जाते और फिल्म देखने तक साथ चलते थे। उन्होंने कभी बहू और बेटी के बीच अंतर महसूस नहीं होने दिया।
परिवार के बड़े जेठ विजय बाली भी खेती-बाड़ी से जुड़े और पुराने ख्यालों वाले थे, लेकिन उन्होंने भी कभी उनके पहनावे या गतिविधियों पर रोक नहीं लगाई। ससुर जी ने एक बार बस इतना कहा था कि कुछ भी पहन लो, लेकिन मर्यादा में रहकर। उर्वशी के लिए यह छोटी सी बात भी विश्वास और सम्मान की बड़ी मिसाल बन गई।
सास ने खाना बनाना सिखाया, लेकिन कभी मायके का ताना नहीं दिया
उर्वशी बाली ने अपनी सास के व्यवहार को भी याद करते हुए लिखा कि उन्हें खाना बनाने का शौक नहीं था और उन्होंने कभी इसे जरूरी भी नहीं समझा था। लेकिन ससुराल आने के बाद उनकी सास ने बड़े धैर्य और प्यार से खाना बनाना सिखाया।
सबसे बड़ी बात यह रही कि कभी यह ताना नहीं दिया कि मायके से खाना बनाना सीखकर क्यों नहीं आईं। उन्होंने बहू की कमी निकालने के बजाय उसे सिखाने का रास्ता चुना।
उर्वशी ने पति के सहयोग का भी जिक्र किया। उनके अनुसार पति हमेशा उन्हें साथ लेकर चले और वह भी हर कदम पर उनका हाथ थामकर आगे बढ़ती रहीं। उन्होंने अपने ससुराल के सभी सदस्यों के स्नेह, सहयोग और सम्मान के प्रति आभार व्यक्त किया।
24-25 साल की बहू से 50-60 साल जैसी समझ की उम्मीद क्यों?
उर्वशी बाली ने अपने अनुभव के आधार पर आज के पारिवारिक रिश्तों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अक्सर परिवार में छोटी उम्र की बहू से ऐसी समझदारी की उम्मीद की जाती है, जो वर्षों के अनुभव के बाद आती है।
एक 24-25 साल की लड़की में 50-60 साल के अनुभवी व्यक्ति जैसी समझ कहां से आ सकती है? उसे परिवार को समझने, रिश्तों को जानने और परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने के लिए समय और सहयोग देना जरूरी है।
उन्होंने वैवाहिक रिश्तों में बढ़ती दूरियों और तलाक के बढ़ते मामलों पर भी चिंता जताई। उनके अनुसार परिवारों में एक-दूसरे को समझना बेहद जरूरी है। उम्र में बड़े लोगों के पास अनुभव होता है, जबकि नई पीढ़ी के पास अपनी सोच और परिस्थितियां होती हैं। दोनों के बीच संवाद और समझदारी ही रिश्तों को मजबूत बना सकती है।
बहू से दहेज नहीं, उसके सपनों का सम्मान करने की अपील
अपने लेख में उर्वशी बाली ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही है। उनके अनुसार बहू से कभी यह मत पूछिए कि वह दहेज में क्या लेकर आई है। बल्कि उससे कहिए कि उसके माता-पिता ने उसे जहां तक पढ़ाया, सिखाया और काबिल बनाया है, अब परिवार उसे उससे भी आगे लेकर जाएगा।
हर बहू अपने साथ एक अलग पहचान, हुनर, सपने और संभावनाएं लेकर आती है। परिवार का प्यार और प्रोत्साहन मिले तो वह अपनी प्रतिभा को और निखार सकती है।
उर्वशी बाली की यह कहानी केवल एक बहू के अच्छे ससुराल की कहानी नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए सीख है जो बहू से तो हर तरह के बदलाव की उम्मीद करते हैं, लेकिन उसके सपनों और व्यक्तित्व को समझने की कोशिश नहीं करते।
उनका संदेश साफ है- बहू को सिर्फ परिवार का हिस्सा मत बनाइए, उसे परिवार की अलग पहचान बनने का अवसर भी दीजिए। क्योंकि बहू के सपनों को पंख देने वाला परिवार ही असल मायने में रिश्तों की खूबसूरती समझता है।
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