फतेहपुर रेंज के 10 किलोमीटर परिधि मेंं नज़र आये चार बाघ
जंगल का जीवन संघर्ष पर टिका है। यहां हिरण से लेकर बाघ-हाथी तक को नई-नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सबसे अहम संघर्ष भोजन को लेकर होता है।
जंगल का ग्लैमर कहे जाने वाले बाघों को लेकर अब तक यह कहा जाता था कि इनका एक दायरा यानी अधिकार क्षेत्र होता है। जिसमें एक बाघ दूसरे बाघ तक को जल्दी से पसंद नहीं करता, लेकिन फतेहपुर रेंज के बाघों ने अपना दायरा बदल लिया है।
10 किमी में नजर आए चार बाघ
10 किलोमीटर परिधि मेंं यहां चार बाघ लगातार नजर आ रहे हैं। जबकि वन संरक्षक दीप चंद्र आर्य का कहना है कि पहले माना जाता था कि एक बाघ का अधिकार क्षेत्र ही 20-25 वर्ग किलोमीटर होता है। ऐसे में इस संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि आसान भोजन की तलाश में बाघ अपने दायरे से बाहर आ रहे हैं।
2018 की गणना में बाघ
2018 में हुई बाघ गणना के बाद उत्तराखंड में इनकी संख्या 442 थी। अकेले कार्बेट पार्क में 252 बाघ सामने आए। इसके अलावा कार्बेट से लेकर नेपाल बार्डर तक से सटे वेस्टर्न सर्किल के पांच वन प्रभागों में 125 बाघ पाए गए।
फतेहपुर रेंज करीब 20 लंबा
फतेहपुर रेंज वेस्टर्न सर्किल के तहत आने वाली रामनगर डिवीजन का हिस्सा है। इस रेंज का जंगल करीब 20 लंबा है। पिछले साल दिसंबर से लेकर इस साल जून तक इस जंगल में सात लोगों की बाघ-बाघिन के हमले में जान जा चुकी है।
फतेहपुर से एक बाघ ट्रेंकुलाइज
सात लोगों का शिकार होने के बाद जून में एक बाघ को ट्रैंकुलाइज भी किया गया। लेकिन बाघिन की तलाश अब तक खत्म नहीं हुई। वहीं, रेंज के जंगल में लगे ट्रैप कैमरों के जरिये पता चला कि फतेहपुर से काठगोदाम तक यानी करीब दस किमी की रेंज में ही चार बाघ घूम रहे हैं। तीन नर व एक मादा है। भले इनकी टाइमिंग अलग है लेकिन जंगल वहीं है।

बदल रही जंगल की कहानी
कैमरों में कैद इन तस्वीरों ने फिलहाल जंगल में बाघों के दायरे और अधिकार क्षेत्र वाली कहानी को बदल दिया है। मामले को लेकर वन संरक्षक दीप चंद्र आर्य का कहना है कि जंगल में हावी रहने की परंपरा भी चलती है। ज्यादा ताकतवर वन्यजीव उस क्षेत्र में प्रभाव जमा लेता है।
ऐसे में हो सकता है कि किसी तय क्षेत्र से एक बाघ ने दूसरे को बाहर कर दिया हो। हालांकि, बाघों को लेकर यह बदलाव क्यों और किस वजह से आ रहा है। इसका अध्ययन भी भारतीय वन्यजीव संस्थान के स्तर पर हो रहा है।
नई गणना अभी सार्वजनिक नहीं
वन विभाग के स्थानीय से लेकर मुख्यालय तक के अधिकारी मानते हैं कि उत्तराखंड में बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है। तराई से लेकर मैदान तक में इनकी उपस्थिति पहले ही नजर आ चुकी है। हर चार साल में गणना होती है। 2018 की गणना 2019 में सार्वजनिक हुई थी। वहीं, पिछले दिनों हुई बाघ गिनती के नतीजे अभी सामने नहीं आए। लेकिन संभावना वृद्धि की ज्यादा है।
बाघों की बढ़ी संख्या भी हो सकती है कारण
वन संरक्षक पश्चिमी वृत्त दीप चंद्र आर्य ने बताया कि बाघों की संख्या बढऩे के कारण भी फतेहपुर रेंज में ऐसी स्थिति बनने की संभावना है। डब्लूआइआइ के शोध में वेस्टर्न सर्किल भी शामिल है। अध्ययन पूरा होने प्रमाणित तथ्य सामने आएंगे।
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