उत्तराखंड की राजनीति का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त: पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी का 92 वर्ष की आयु में निधन; देश और प्रदेश में शोक की लहर

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देहरादून: उत्तराखंड के राजनीतिक गलियारे से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सबसे कद्दावर व वरिष्ठ नेताओं में से एक, मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूड़ी का 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। वह पिछले कुछ समय से गंभीर रूप से अस्वस्थ चल रहे थे और देहरादून के मैक्स अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था। उनके निधन की सूचना मिलते ही पूरे देश और प्रदेश में शोक की लहर दौड़ गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए इसे उत्तराखंड और राष्ट्रीय राजनीति के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया है।

अटल जी के एक फोन ने फौजी अफसर को बनाया ‘जनरल साहब’

मेजर जनरल खंडूड़ी की राजनीति में एंट्री किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी। साल 1990 में जब देश मंडल आंदोलन की आग में जल रहा था, तब सेना की कोर ऑफ इंजीनियर्स से मेजर जनरल के पद से रिटायर हुए खंडूड़ी दिल्ली का सरकारी आवास छोड़कर देहरादून लौटने की तैयारी में थे। उनकी राजनीति में आने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी। तभी भाजपा के एक बड़े नेता का फोन आया कि ‘अटल जी आपसे मिलना चाहते हैं।’ इस मुलाकात के बाद अटल बिहारी वाजपेयी उन्हें देहरादून में अपनी एक जनसभा में ले गए और मंच के पीछे बैठे इस शांत फौजी अफसर को आगे बुलाकर भाषण देने को कहा। बस यहीं से राजनीति में ‘जनरल साहब’ का जन्म हुआ।

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कांग्रेस के गढ़ से निकले भाजपा के ईमानदार पहाड़ी चेहरे

1 अक्टूबर 1934 को जन्मे खंडूड़ी का परिवार मूल रूप से कांग्रेस की राजनीति से जुड़ा था। उनकी मां कांग्रेस में सक्रिय थीं और उनके मामा हेमवती नंदन बहुगुणा कांग्रेस के दिग्गज नेता थे। उनके ममेरे भाई विजय बहुगुणा (पूर्व मुख्यमंत्री) भी राजनीति में थे। इसके बावजूद अटल जी ने खंडूड़ी के भीतर छिपे अनुशासन और ईमानदारी को पहचाना। साल 1991 में भाजपा ने उन्हें गढ़वाल लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में उतारा। पहली ही लड़ाई में उन्होंने तत्कालीन दिग्गज नेता सतपाल महाराज को हराकर संसद का रुख किया और सबको चौंका दिया।

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वाजपेयी सरकार में ‘सड़क क्रांति’ के जनक

संसद पहुंचने के बाद अटल जी का भरोसा खंडूड़ी पर लगातार बढ़ता गया। साल 1999 में जब केंद्र में अटल जी की सरकार बनी, तो खंडूड़ी को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की कमान सौंपी गई। उनके इसी कार्यकाल में देश में सड़कों और हाईवे की तस्वीर बदलनी शुरू हुई। आज देश के सुदूर गांवों को जोड़ने वाली ‘प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना’ (PMGSY) को जमीन पर उतारने और उसकी मजबूत नींव रखने का श्रेय जनरल खंडूड़ी के प्रशासनिक कौशल और दूरदृष्टि को ही जाता है।

जब-जब संकट आया, भाजपा को याद आए खंडूड़ी

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जब भाजपा के भीतर गुटबाजी चरम पर थी, तब दिल्ली हाईकमान को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो सरकार और संगठन दोनों को अनुशासन का पाठ पढ़ा सके। पार्टी ने एक बार फिर खंडूड़ी पर भरोसा जताया और वह साल 2007 से 2009 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। उनके कार्यकाल को ‘जीरो टॉलरेंस’ और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त फैसलों के लिए जाना जाता है। इसके बाद जब 2011 में सरकार पर दोबारा भ्रष्टाचार के आरोप लगे और पार्टी की साख दांव पर थी, तो चुनाव से ऐन पहले भाजपा ने फिर से अपने इस सबसे ईमानदार चेहरे को आगे किया और वह दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने।

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विरासत में छोड़ गए सिद्धांतों की राजनीति

भुवन चंद्र खंडूड़ी की बेटी रितु खंडूरी वर्तमान में उत्तराखंड विधानसभा की पहली महिला स्पीकर हैं, जबकि उनके बेटे मनीष खंडूड़ी भी राजनीति में सक्रिय हैं। जनरल साहब उस दौर की राजनीति के प्रतीक थे जहां नेता की सबसे बड़ी पूंजी उसकी व्यक्तिगत विश्वसनीयता और ईमानदारी होती थी। आज की आक्रामक राजनीति के दौर में भी खंडूड़ी अपनी कड़क छवि और बेदाग चरित्र के कारण हमेशा अलग नजर आए। देवभूमि उत्तराखंड उन्हें सिर्फ एक पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि सिद्धांतों और अनुशासन के एक अद्वितीय प्रतीक के रूप में हमेशा याद रखेगी।