
राजू अनेजा, काशीपुर।दिनभर चली धन्यवाद यात्रा भले ही अपने पड़ाव तक पहुंच गई, लेकिन काशीपुर में सामने आए घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में सवाल खड़े कर दिए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने काशीपुर से लेकर रामनगर और हल्द्वानी तक यात्रा के दौरान पुलिस-प्रशासन की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे कथित तौर पर यात्रा को प्रभावित करने की कोशिश बताया है।
रावत ने आरोप लगाया कि उन्हें पहले मुख्य मार्ग से जाने की अनुमति नहीं दी गई। इसके बाद उनके काफिले के वाहनों को रास्ता भटकाया गया और जिस वाहन को एस्कॉर्ट के रूप में लगाया गया था, उसी के दूसरी दिशा में चले जाने से पूरा काफिला प्रभावित हुआ। रावत के मुताबिक, सामान्य तौर पर जहां यात्रा के दौरान ट्रैफिक से बचाने के लिए पुलिस एस्कॉर्ट उपलब्ध कराई जाती थी, वहीं इस बार ऐसा नहीं हुआ।
‘पहले आरओबी-पुलिया का बहाना, फिर काफिले को रास्ता भटकाया’
रावत ने कहा कि उन्होंने अपने कार्यक्रम की पूरी जानकारी पहले ही होम सेक्रेटरी और कमिश्नर को दे दी थी। पुलिस को भी यात्रा का पूरा कार्यक्रम उपलब्ध कराया गया था। इसके बावजूद काशीपुर पहुंचने पर उन्हें मुख्य मार्ग से जाने की अनुमति नहीं दी गई।
उनके मुताबिक, प्रशासन की ओर से बताया गया कि आरओबी टूटा हुआ है और एक पुलिया भी खराब है, जिसके कारण मुख्य मार्ग से निकलना संभव नहीं है।
रावत ने इसी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि पुलिया और आरओबी की स्थिति पहले से खराब थी तो प्रशासन ने वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की? उन्होंने सवाल किया कि पांच-सात दिन में एक पुलिया तक दुरुस्त नहीं हो पाई तो इतनी बड़ी यात्रा के लिए पहले से ट्रैफिक प्लान क्यों तैयार नहीं किया गया?
‘जब काफिला चला तो एस्कॉर्ट ही बन गई रास्ता भटकाने वाली गाड़ी’
रावत के आरोपों का सबसे गंभीर हिस्सा काफिले की एस्कॉर्ट व्यवस्था को लेकर है। उन्होंने कहा कि काशीपुर से निकलने के बाद उनके साथ चल रही कई गाड़ियों को गलत दिशा में ले जाया गया।
रावत का दावा है कि जिस वाहन को उनकी एस्कॉर्ट के तौर पर लगाया गया था, वही उनके साथ चल रहे वाहनों को दूसरी दिशा में लेकर चला गया।
इसके चलते मुख्य काफिले और पीछे चल रहे वाहनों के बीच दूरी बन गई। रावत के मुताबिक उन्हें रास्ते में वाहनों का इंतजार करना पड़ा और काफी मशक्कत के बाद वे वाहन दोबारा काफिले से जुड़ सके।
‘मंजिल नहीं, रास्ता रोकने की कोशिश थी?’
यहीं से रावत ने पूरे घटनाक्रम को लेकर बड़ा सवाल खड़ा किया। उनका आरोप है कि घटनाओं की कड़ी सामान्य प्रशासनिक अव्यवस्था से आगे जाती दिखाई दी।
उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि यात्रा को इस तरह प्रभावित किया गया कि वह समय पर रामनगर नहीं पहुंच पाए और आगे हल्द्वानी तक भी यात्रा की गति प्रभावित रहे।
हालांकि यह रावत का आरोप है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
‘पहले एस्कॉर्ट मिलती थी, आज रास्ते भर गायब रही’
रावत ने कहा कि जब भी इस तरह का बड़ा कार्यक्रम होता है तो पुलिस प्रशासन की ओर से ट्रैफिक व्यवस्था को नियंत्रित करने और काफिले को जाम में फंसने से बचाने के लिए एस्कॉर्ट दी जाती है।
उनका कहना है कि आज काशीपुर से लेकर रामनगर और हल्द्वानी तक वह व्यवस्था दिखाई नहीं दी, जिसकी सामान्य तौर पर अपेक्षा रहती है।
रावत के अनुसार, यदि एस्कॉर्ट नहीं होगी तो बड़े काफिले के जाम में फंसने की संभावना बढ़ेगी और यात्रा निर्धारित समय पर पूरी नहीं हो पाएगी।
‘क्या पुलिस व्यवस्था को राजनीतिक कार्यक्रमों में उलझाया जा रहा है?’
रावत ने पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने सवाल उठाया कि पुलिस का मूल दायित्व अपराध नियंत्रण और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन यदि अधिकारियों का समय राजनीतिक गतिविधियों की व्यवस्थाओं को प्रभावित करने में खर्च हो रहा है तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने इसे ‘पेटी पॉलिटिक्स’ से जोड़ते हुए कहा कि ऐसे अधिकारियों की भूमिका पर सरकारों को विचार करना चाहिए।
सीमांत क्षेत्रों में ‘कूलिंग ड्यूटी’ की सलाह
रावत यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा कि भविष्य में जो भी पार्टी सत्ता में आए, उसे ऐसे पुलिस अधिकारियों के लिए ऐसी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए, जिसके तहत उन्हें कुछ समय के लिए सीमांत क्षेत्रों में भेजा जाए।
उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि सीमांत क्षेत्रों में बाहरी घुसपैठ जैसे मुद्दों से निपटने के लिए ऐसे अधिकारियों को ‘स्पेशल ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी’ बनाया जा सकता है।
रावत का यह बयान पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर उनकी नाराजगी की तीव्रता को दिखाता है।
‘ये अधिकारी अपराध कैसे रोकेंगे?’—हरदा का तीखा सवाल
रावत ने कहा कि पुलिस का इतना महत्वपूर्ण तंत्र यदि इस तरह के कामों में उलझा रहेगा तो अपराध नियंत्रण और कानून-व्यवस्था जैसे मूल दायित्व प्रभावित हो सकते हैं।
उन्होंने सवालिया अंदाज में कहा कि यदि अधिकारियों का अधिकांश समय इस तरह की राजनीतिक गतिविधियों में लग रहा है तो वे अपराध रोकने और आम जनता को सुरक्षा देने के लिए कितना समय दे पाएंगे?
नैनीताल पुलिस का शानदार इतिहास था, आज दुख हो रहा’
अपने बयान के अंत में रावत ने नैनीताल पुलिस के पुराने इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि नैनीताल पुलिस की एक शानदार परंपरा रही है, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम से उन्हें दुख हुआ है।
उनका कहना है कि पुलिस की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर जनता का भरोसा लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यदि राजनीतिक यात्राओं के दौरान पुलिस की भूमिका पर सवाल उठते हैं तो सरकार और पुलिस नेतृत्व को इन सवालों का जवाब देना चाहिए।
अब सवाल सिर्फ एस्कॉर्ट का नहीं, पूरी व्यवस्था पर है
रावत के आरोपों के बाद सवाल केवल यह नहीं रह गया है कि एस्कॉर्ट वाहन रास्ता क्यों भटका या मुख्य मार्ग पर यात्रा की अनुमति क्यों नहीं दी गई। बड़ा सवाल यह है कि एक पूर्व मुख्यमंत्री की सैकड़ों वाहनों वाली यात्रा के लिए पुलिस और प्रशासन ने किस स्तर की ट्रैफिक एवं सुरक्षा योजना तैयार की थी?
यदि आरओबी और पुलिया पहले से बाधित थे तो वैकल्पिक रूट की पूर्व व्यवस्था क्यों नहीं की गई? यदि एस्कॉर्ट निर्धारित थी तो वह काफिले के साथ क्यों नहीं रही? और यदि वाहनों का रूट बदला गया तो उसका आदेश किस स्तर से हुआ?
इन सवालों के जवाब पुलिस और प्रशासन के आधिकारिक पक्ष से ही सामने आ सकते हैं। फिलहाल रावत के आरोपों ने काशीपुर से लेकर नैनीताल तक यात्रा के दौरान पुलिस व्यवस्था को लेकर नई राजनीतिक बहस जरूर छेड़ दी है।
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