ठुकराल की एंट्री से पहले कांग्रेस की चौखट पर ‘मीना’ बनी दीवार, अब सियासी गांठ सुलझाने को क्या बेहड़ ने संभाला मोर्चा ?

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राजू अनेजा ,काशीपुर।रुद्रपुर के पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल की कांग्रेस में एंट्री अब सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं रही। वर्षों के राजनीतिक वनवास के बाद कांग्रेस में आने की तैयारी कर रहे ठुकराल की राह में इस बार कांग्रेस की ही कद्दावर नेत्री मीना शर्मा सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ी हो गई हैं।
मीना शर्मा ने ठुकराल के खिलाफ दर्ज मुकदमों को आधार बनाते हुए सीधे कांग्रेस हाईकमान को पत्र भेजकर न केवल उनकी एंट्री पर आपत्ति दर्ज कराई, बल्कि इस पूरे मामले को दिल्ली के सियासी गलियारों तक पहुंचा दिया। राहुल गांधी और सोनिया गांधी को भेजे गए इस पत्र के बाद पार्टी के भीतर हलचल तेज हो गई है।

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वही मीना शर्मा के इस कदम के बाद कांग्रेस में संभावित एंट्री पर सवालिया निशान लग गया है। माना जा रहा है कि यह केवल संगठनात्मक आपत्ति नहीं, बल्कि भीतरखाने चल रही गुटीय राजनीति का भी संकेत है।
इसी बीच राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी माने जाने वाले पूर्व मंत्री एवं किच्छा विधायक तिलक राज बेहड़ की आज मीना शर्मा से हुई मुलाकात ने चर्चाओं को और हवा दे दी है। भले ही इस मुलाकात को औपचारिक तौर पर शिष्टाचार भेंट बताया जा रहा हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे मीना शर्मा को मनाने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।इस सियासी घमासान के बीच पूर्व मंत्री और किच्छा विधायक तिलक राज बेहड़ की मीना शर्मा से मुलाकात को हल्के में नहीं लिया जा रहा। भले ही इसे औपचारिक शिष्टाचार भेंट कहा जा रहा हो, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह मुलाकात डैमेज कंट्रोल और संतुलन साधने की कोशिश है।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं कि राजकुमार ठुकराल कांग्रेस में आएंगे या नहीं, बल्कि यह भी कि पार्टी में फैसला किसका चलेगा — ज़मीनी नेतृत्व का या हाईकमान का?
क्या मीना शर्मा अपने रुख पर अडिग रहेंगी या तिलक बेहड़ की मध्यस्थता रंग लाएगी?
चुनाव नजदीक हैं और ऐसे वक्त में यह सियासी खींचतान कांग्रेस के लिए अंदरूनी परीक्षा बन चुकी है। एक तरफ नए चेहरों को जोड़ने की मजबूरी, तो दूसरी ओर पुराने नेताओं की आपत्तियां — यही द्वंद्व आज कांग्रेस की सियासत को परिभाषित कर रहा है।
कुल मिलाकर, राजकुमार ठुकराल की एंट्री अब केवल ज्वाइनिंग नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर शक्ति-संतुलन और नेतृत्व की दिशा तय करने वाली लड़ाई बन चुकी है।
अब निगाहें टिकी हैं अगले कदम पर — क्योंकि यहीं से तय होगी आने वाले चुनावों की पटकथा।

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