हैट्रिक की तैयारी में जुटी भाजपा, चुनाव से पहले आखिर कैसे सुलझाएगी ‘राजस्व गांव’ का मुद्दा?

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राजू अनेजा,लालकुआं।उत्तराखंड में हैट्रिक लगाने की तैयारी में जुटी भाजपा के सामने लालकुआं की वीआईपी सीट पर बिंदुखत्ता को राजस्व गांव घोषित करने का मुद्दा अब बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। वर्षों से लंबित इस मांग को लेकर जनता में नाराजगी साफ झलक रही है और चुनावी साल में यह मुद्दा सरकार की साख पर सीधा सवाल बन गया है।

 

‏वोट मिले, लेकिन हक नहीं—जनता में बढ़ता आक्रोश

भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही दलों ने समय-समय पर बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाने के बड़े-बड़े वादे किए, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी जस की तस है। लोगों को उम्मीद थी कि दोबारा सत्ता में आने के बाद भाजपा इस वादे को पूरा करेगी, लेकिन अब तक कोई ठोस फैसला न होने से जनता खुद को ठगा महसूस कर रही है।

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सड़क पर उतरे लोग, शहीद स्मारक बना आंदोलन का केंद्र

बुधवार को बिंदुखत्ता में शहीद स्मारक पर विशाल जनसभा और खुली बहस का आयोजन हुआ, जिसमें भारी जनसैलाब उमड़ा।
वन अधिकार संगठन और पूर्व सैनिक संगठन के संयुक्त मोर्चे के बैनर तले हुए इस आंदोलन ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है।
👉 “जन-जन की सरकार कब आएगी बिंदुखत्ता के द्वार” अभियान के तहत
👉 तीन दिवसीय आंदोलन का हुआ समापन
👉 धरना स्थल पर दिनभर गूंजे नारे और विरोध

 

प्रशासन भी मंच पर, लेकिन समाधान अब भी दूर

खास बात यह रही कि एडीएम विवेक राय, डीएफओ हिमांशु बांगरी और एसडीएम रेखा कोहली जैसे अधिकारी भी खुली बहस में पहुंचे और लोगों की समस्याएं सुनीं।
लेकिन सवाल वही—सुनवाई के बाद कार्रवाई कब?

अनशन की चेतावनी, आंदोलन हुआ और तेज

 

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धरना स्थल पर कई लोग क्रमिक अनशन पर बैठे, जबकि वन अधिकार समिति के अध्यक्ष अर्जुन नाथ गोस्वामी ने बड़ा ऐलान कर दिया—
👉 “जब तक बिंदुखत्ता राजस्व गांव नहीं बनेगा, अन्न ग्रहण नहीं करूंगा।”
यह ऐलान आंदोलन को और उग्र करने के संकेत दे रहा है।
हर दल का समर्थन, सरकार पर बढ़ा दबाव
जनसभा में पूर्व कैबिनेट मंत्री हरीश चंद्र दुर्गापाल समेत कई राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने खुलकर समर्थन दिया।
सभी वक्ताओं ने एक सुर में कहा—बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाना जनता का हक है, इसे अब और टाला नहीं जा सकता।

 

भाजपा के लिए ‘अग्निपरीक्षा’, हैट्रिक पर असर संभव

लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का सपना देख रही भाजपा के लिए बिंदुखत्ता का मुद्दा अब अग्निपरीक्षा बन गया है।
अगर चुनाव से पहले समाधान नहीं निकला, तो यह मुद्दा वोटिंग पैटर्न को सीधे प्रभावित कर सकता है।

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लालकुआं की जमीन पर जनता का सीधा सवाल है—
“वादे कब पूरे होंगे?”
अब देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा चुनाव से पहले इस सियासी बारूद को शांत कर पाती है या यही मुद्दा उसकी हैट्रिक की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बन जाता है।