
जंगल से आबादी और रेलखंड तक पहुंच रहे वन्यजीवों की सुरक्षा बनी चुनौती
राजू अनेजा, पंतनगर। विकास की तेज रफ्तार के बीच क्या वन्यजीवों के प्राकृतिक रास्ते सिमटते जा रहे हैं? जंगलों में पानी और भोजन की तलाश में भटकते वन्यजीव आखिर जाएं तो जाएं कहां? हल्दी रोड–छत्तरपुर रेलखंड पर मंगलवार रात एक नर हाथी की मौत ने ऐसे ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रेल की पटरियों पर बेजुबान गजराज का सफर थमने के साथ ही वन्यजीवों की सुरक्षा और उनके प्राकृतिक आवागमन के रास्तों को सुरक्षित रखने की जरूरत एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
जंगल से रेलवे ट्रैक तक क्यों पहुंच रहे गजराज?
हल्दी रोड रेलवे स्टेशन के पीछे पंतनगर विश्वविद्यालय के कृषि वानिकी अनुसंधान केंद्र का बांस का जंगल है। आसपास कल्याणी, बैगुल, फूलवा और बेनी नदियां भी बहती हैं। यह क्षेत्र वन्यजीवों की आवाजाही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में जंगल से निकलकर रेलवे ट्रैक तक हाथियों का पहुंचना चिंता बढ़ाता है।
हालांकि, मंगलवार रात हुई हाथी की मौत की वास्तविक परिस्थितियों और कारणों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। फिर भी यह घटना इस बात की ओर ध्यान खींचती है कि वन्यजीवों की आवाजाही वाले इलाकों में रेलवे ट्रैक और अन्य विकास परियोजनाओं के बीच सुरक्षित रास्ते सुनिश्चित करना कितना जरूरी है।
एक ही रेलखंड पर तीन हादसे, चार हाथियों की मौत
हल्दी रोड–छत्तरपुर रेलखंड पर हाथियों की मौत का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले 17 अप्रैल 2017 को मौजूदा घटनास्थल से करीब 200 मीटर की दूरी पर ट्रेन की चपेट में आने से दो कम उम्र की मादा हाथियों की मौत हो गई थी। इसके बाद 27 मई 2018 को सीमैप के पास रेलवे लाइन पार करते समय एक मादा हाथी की जान चली गई थी।
अब मंगलवार रात नर हाथी की मौत के बाद इस रेलखंड पर तीन घटनाओं में चार हाथियों की जान जाने का उल्लेख सामने आया है। बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएं रेलवे ट्रैक के आसपास वन्यजीवों की सुरक्षा के इंतजामों की समीक्षा की जरूरत को रेखांकित करती हैं।
जंगल में पानी की कमी भी बढ़ा सकती है मुश्किलें
टांडा जंगल में पांच तालाब और 12 मौसमी जलधाराएं होने की जानकारी सामने आई है। गर्मी और मौसम में बदलाव के दौरान प्राकृतिक जलस्रोतों में पानी की उपलब्धता घटने पर वन्यजीवों को पानी की तलाश में दूसरे क्षेत्रों की ओर जाना पड़ सकता है। हालांकि, मौजूदा घटना में पानी की कमी हाथी के रेलवे ट्रैक तक पहुंचने का कारण थी या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
विशेषज्ञों के अनुसार, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास, जलस्रोतों और आवाजाही के रास्तों को सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि भोजन और पानी की तलाश में उन्हें मानव बस्तियों तथा दुर्घटना संभावित क्षेत्रों की ओर जाने के लिए मजबूर न होना पड़े।
विकास के साथ वन्यजीवों के रास्तों की सुरक्षा भी जरूरी
सड़क और रेल परियोजनाएं विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन इनके निर्माण और संचालन के दौरान वन्यजीवों के पारंपरिक रास्तों का ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हाथियों के आवागमन वाले क्षेत्रों में सुरक्षित क्रॉसिंग, संवेदनशील रेलखंडों की पहचान, गति नियंत्रण और समय पर चेतावनी जैसे उपाय दुर्घटनाओं का खतरा कम करने में मददगार हो सकते हैं।
देश और उत्तराखंड में हाथी कॉरिडोर से जुड़े आंकड़ों को आधिकारिक स्रोतों से सत्यापित करना जरूरी है। लेकिन हल्दी रोड–छत्तरपुर रेलखंड पर बार-बार हुई घटनाएं स्थानीय स्तर पर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता जरूर सामने रखती हैं।
हादसे की पुनरावृत्ति रोकने के लिए रेलवे से समन्वय
तराई केंद्रीय वन प्रभाग के डीएफओ यूसी तिवारी ने बताया कि घटनास्थल और परिस्थितियों से जुड़ी जानकारी जुटाई जाएगी। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए रेलवे के साथ समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा।
सवाल वही—गजराज जाएं तो जाएं कहां?
नर हाथी की मौत केवल एक वन्यजीव के जीवन का अंत नहीं, बल्कि जंगलों, जलस्रोतों, प्राकृतिक गलियारों और विकास के बीच संतुलन बनाने की चुनौती की याद भी है। यदि वन्यजीवों के आने-जाने के रास्ते सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो जंगल से निकलने वाले बेजुबान जानवर दुर्घटनाओं के जोखिम में आते रहेंगे।
विकास की रफ्तार अपनी जगह जरूरी है, लेकिन उसके बीच गजराज के रास्ते और उनकी प्यास भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती। सवाल यही है—जब जंगल के रास्ते सिमटेंगे, तो प्यास बुझाने आखिर जाएं तो जाएं कहां?
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