इन कारणों से राष्ट्रपति चुनाव में PM मोदी फिर से हर किसी को चौंका सकते हैं

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वर्ष 2022 के राष्ट्रपति चुनाव 25 जुलाई को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल समाप्त होने पर होंगे। यद्यपि यह एक अलंकारिक पद है क्योंकि वास्तविक शक्तियां चुने हुए प्रधानमंत्री के हाथों में होती हैं, फिर भी इन चुनावों को लेकर हमेशा असमंजस बना रहता है।

इस बारे कोई अनुमान लगाना जल्दबाजी हो सकती है लेकिन वर्तमान परिदृश्य कोई असमंजस पैदा करने वाला नहीं है क्योंकि सत्ताधारी भाजपा के पास आसानी से अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए जादुई आंकड़ा है। राजग सहयोगियों तथा विपक्ष के बीच अंतर काफी चौड़ा है। फिर भी विपक्ष भाजपा का विरोध करने के लिए संभवत: कोई उम्मीदवार मैदान में उतारेगा।

यह याद रखने के लिए 2 अन्य चीजें भी हैं। पहली यह कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संभवत: अंतिम समय तक अपने पत्ते छुपा कर रख सकते हैं, यद्यपि भाजपा ने अपने अभिभावक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) के सहयोग से कार्रवाई शुरू कर दी है।

दूसरे, इस बात की पूरी संभावना है कि मोदी संभवत: हर किसी को चौंका सकते हैं क्योंकि उन्होंने इन 8 वर्षों में ऐसा अपनी पसंद के मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, स्पीकरों और यहां तक कि मंत्रियों को विभाग बांटने के मामले में भी किया है। जैसा कि स्मृति ईरानी को पहले मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया गया था या निर्मला सीतारमण को रक्षा मंत्री या वित्त मंत्री अथवा मनोहर लाल खट्टर को हरियाणा का मुख्यमंत्री। बाद में इन सभी ने खुद को साबित किया।

2019 में मोदी का लोकसभा स्पीकर के लिए चयन भी उतना ही हैरानीजनक था। यहां तक कि पदासीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जो 350 एकड़ में फैले राष्ट्रपति भवन में रहते हैं, का चुनाव सर्वाधिक अप्रत्याशित था। राष्ट्रपति कोविंद बहुत प्रख्यात नहीं हैं और न ही उनके साथ कोई विवाद जुड़ा है तथा न ही उन्होंने इन सभी पांच वर्षों में मोदी को कोई चिंतित करने वाले पल दिए। 2019 में 17वीं लोकसभा के लिए चुनावों के बाद सत्ता का हस्तांतरण बहुत सहज तरीके से हुआ। आप सबकी जानकारी के लिए, मोदी एक अन्य हैरानीजनक फैसला लेते हुए पदासीन राष्ट्रपति को बनाए रखते हुए उन्हें दूसरा कार्यकाल दे सकते हैं। पारम्परिक तौर पर स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के अतिरिक्त किसी भी राष्ट्रपति को दूसरा कार्यकाल नहीं मिला।

पहले राष्ट्रपति चुनाव 2 मई 1952 को हुए थे। चार दिन बाद 507400 वोटों के साथ डा. राजेंद्र प्रसाद विजेता बने। 1957 में उन्होंने दूसरी बार चुनाव जीता। अभी तक वह इस पद पर 2 कार्यकालों तक रहने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं। मोदी के पास पार्टी के भीतर तथा बाहर चुनने के लिए काफी उम्मीदवार हैं। दौड़ में सबसे आगे हैं उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू। यह एक परम्परा रही है कि उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति के तौर पर पदोन्नत किया जाए। ऐसा राधाकृष्णनन, के.आर. नारायणन, शंकर दयाल शर्मा तथा आर. वेंकटरमन  व अन्य के मामले में हुआ। नायडू एक सम्मानित तथा परिपक्व राजनीतिज्ञ और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष हैं। वह राजनीति को अच्छी तरह से समझते हैं।

भाजपा तथा इसके सहयोगी 17 राज्यों तथा एक केंद्र शासित प्रदेश में शासन कर रहे हैं। कुल 10,98,903 वोटें हैं। भाजपा के पास 4,65,797 वोटें हैं तथा इसके गठबंधन सांझीदारों के पास 71,329 वोटें। इससे इनके पास 9,194 वोटों की कमी रह जाती है। प्रधानमंत्री अधिकतर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के चयन के बारे में अत्यंत सतर्क रहते हैं। ज्ञानी जैल सिंह तथा प्रधानमंत्री राजीव गांधी और इससे पहले इंदिरा गांधी व राष्ट्रपति नीलम संजीवा रैड्डी के कार्यकाल के दौरान कुछ विवाद रहे। यहां तक कि पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद के भी प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ कुछ मतभेद थे।

राष्ट्रपति के चयन के मामले में सर्वसम्मति वास्तव में विवाद का विषय है। अपने उम्मीदवारों को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा के पास एक सहज बहुमत है। बेहतर होगा कि यदि भाजपा विपक्ष के साथ सलाह-मशविरा करके अपने उम्मीदवार को सर्वसम्मति से चयनित करवाए। मगर भाजपा तथा विपक्ष के बीच वर्तमान आक्रामक माहौल के चलते संभवत: ऐसा नहीं होगा। अपना उम्मीदवार चुनने के लिए मोदी के पास काफी विकल्प हैं। यह एक प्रश्नचिन्ह है कि क्या विस्तृत राष्ट्रपति भवन में बिठाने के लिए वह अन्य पार्टियों से किसी को पसंद करेंगे? राजनीतिज्ञों में से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, बसपा प्रमुख मायावती, पूर्व भाजपाध्यक्ष राजनाथ सिंह तथा राकांपा प्रमुख शरद पवार आदि के नाम चर्चा में हैं।

भाजपा की जनजातीय महिला नेताएं दो अन्य नाम हैं-अनुसुइया उइके (छत्तीसगढ़ की राज्यपाल) तथा द्रौपदी मुर्मू (झारखंड की पूर्व राज्यपाल)।  दो राज्यपालों थावरचंद गहलोत तथा आरिफ मोहम्मद खान के नाम भी चर्चा में हैं। खान कांग्रेस से आए हैं तथा एक मुस्लिम चेहरा हैं। कर्नाटक के राज्यपाल गहलोत मोदी के करीबी हैं। मैं शर्त लगाकर कह सकती हूं कि इस बात की अधिक संभावना है कि मोदी गहलोत को चुनेंगे, जिन पर वह विश्वास करते हैं।

इस बीच विपक्षी दल एक संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। क्या यह सिरे चढ़ेगा, यह काफी हद तक ममता बनर्जी (पश्चिम बंगाल), एम.के. स्टालिन (तमिलनाडु), उद्धव ठाकरे (महाराष्ट्र) तथा के. चंद्रशेखर राव (तेलंगाना) जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों पर निर्भर करता है। मोदी कोविंद के उत्तराधिकारी के तौर पर भाजपा में से एक वफादार, लोप्रोफाइल वाले तथा कम पहचान वाले किसी व्यक्ति की तलाश में हैं जिस किसी को भी वह इस पद के लिए चुनेंगे वह एक वफादार होना चाहिए।

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