
राजू अनेजा, काशीपुर।विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच काशीपुर का महाराणा प्रताप चौक स्थित आरओबी अब हकीकत की ऐसी तस्वीर पेश कर रहा है, जिसने पूरे सिस्टम की पोल खोल दी है। करोड़ों रुपये की लागत, सात साल का इंतजार और उद्घाटन के महज एक साल के भीतर ही पुल की हालत यह हो गई है कि अब यह मजबूती नहीं, बल्कि “पैबंदों के सहारे” खड़ा नजर आता है। हर गुजरते भारी वाहन के साथ यह ढांचा जैसे अपनी सांसें गिनता दिखता है।
सात साल में बना, एक साल में ही उखड़ने लगा भरोसा
साल 2017 में शुरू हुआ निर्माण कार्य 2024 में पूरा हुआ, लेकिन शुरुआत से ही इस आरओबी की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे। मार्च में दरारें पड़ने के बाद भारी वाहनों की आवाजाही पर रोक लगाई गई थी और आनन-फानन में मरम्मत कराकर दोबारा ट्रैफिक खोल दिया गया। लेकिन यह राहत अस्थायी साबित हुई। महज कुछ महीनों में ही एक्सपेंशन ज्वाइंट फिर जवाब देने लगे और डामर उखड़कर नीचे की सच्चाई उजागर करने लगा।
मौजूदा हालात यह हैं कि जगह-जगह ज्वाइंट टूट चुके हैं और सड़क की परतें उखड़ रही हैं।
मरम्मत का खेल जारी, स्थायी समाधान नदारद
यह केवल तकनीकी खामी नहीं, बल्कि किसी बड़े हादसे का सीधा संकेत है। रविवार को अधिशासी अभियंता आशुतोष खुद मौके पर पहुंचे और मरम्मत कराई गई, लेकिन सवाल वही—क्या हर बार पैबंद लगाकर इस खतरे को टाला जा सकता है?
रात के अंधेरे में काल बनकर दौड़ते डंपर हादसे को दे रहे न्योता
सबसे बड़ा सवाल सिस्टम की प्राथमिकताओं पर है। जब पुल भारी वाहनों का दबाव सहन करने में असमर्थ दिख रहा है, तो फिर ओवरलोड डंपरों की आवाजाही पर सख्त रोक क्यों नहीं लगाई जा रही? क्या नियम केवल दिखावे के लिए हैं या फिर किसी दबाव में सुरक्षा से समझौता किया जा रहा है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि रात के समय ओवरलोड वाहन बेखौफ गुजरते हैं और जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे रहते हैं।
जांच के आदेश ठंडे बस्ते में, जवाबदेही शून्य
चौंकाने वाली बात यह भी है कि पहले हुई क्षति के बाद जांच के आदेश तो दिए गए, लेकिन आज तक न तो रिपोर्ट सार्वजनिक हुई और न ही किसी जिम्मेदार पर कार्रवाई। करोड़ों की इस परियोजना में गुणवत्ता और निगरानी दोनों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, लेकिन जवाबदेही तय करने की बजाय हर बार मरम्मत का सहारा लिया जा रहा है।
भारी वाहनों के दबाव में ‘हांफ’ रहा पुल
सबसे गंभीर पहलू यह है कि यह आरओबी भारी वाहनों का दबाव सहन करने में नाकाम दिख रहा है। ओवरलोड डंपर और ट्रक जैसे ही गुजरते हैं, पुल की हालत बिगड़ती नजर आती है। पहले भी दरारें आने के बाद भारी वाहनों पर रोक लगाई गई थी, लेकिन कुछ ही समय बाद फिर से उन्हें अनुमति दे दी गई। अब हालात फिर वहीं पहुंच गए हैं, लेकिन इस बार भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा।
सियासी चुप्पी पर भी उठे सवाल
इस पूरे मामले में जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। चुनाव के समय विकास की बात करने वाले नेता अब इस “कराहते पुल” पर खामोश क्यों हैं? क्या जनता की सुरक्षा से ज्यादा अहम फाइलों का संतुलन है?
हकीकत यह है कि काशीपुर का यह आरओबी अब सुविधा से ज्यादा खतरे का संकेत बन चुका है। अगर समय रहते ठोस और स्थायी कदम नहीं उठाए गए, तो यह पुल किसी बड़े हादसे की वजह बन सकता है। सवाल अब भी वही है—क्या सिस्टम जागेगा, या फिर किसी अनहोनी के बाद ही जिम्मेदारों की नींद खुलेगी?
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