राजू अनेजा,हल्द्वानी में खुद को गोली मारकर आत्महत्या करने वाले सुखवंत सिंह की मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। यह सिर्फ एक व्यक्ति की आत्महत्या नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर लगा गंभीर आरोप है, जिसने समय रहते सुनवाई नहीं की। सरकार अब मदद और जांच की बात कर रही है, लेकिन सवाल यह है कि अगर यही सख्ती पहले दिखाई जाती, तो क्या आज सुखवंत सिंह जिंदा होता?
सूत्रों के मुताबिक काशीपुर में सुखवंत सिंह जैसे न जाने कितने मामले आज भी सिस्टम की फाइलों में कैद हैं। भूमि विवाद और लेनदेन से जुड़े ये प्रकरण वर्षों से अधर में लटके हुए हैं, जहां पीड़ित इंसाफ की आस लगाए थानों, तहसीलों और दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। कार्रवाई न होने के कारण कई लोग सुखवंत की तरह मानसिक और आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जैसे ही किसी मामले में प्रभावशाली या राजनीतिक संरक्षण प्राप्त लोगों का नाम सामने आता है, पुलिस-प्रशासन की रफ्तार थम जाती है। जांच आगे बढ़ने के बजाय “जांच जारी है” के जुमले में उलझ कर रह जाती है। इस दौरान शिकायतें फाइलों में दफन होती रहती हैं और उधर पीड़ित टूटता चला जाता है।
आरोप यह भी है कि सिस्टम की यही चुप्पी और संवेदनहीनता लोगों को आत्महत्या जैसे खौफनाक कदम उठाने के लिए मजबूर कर रही है। सुखवंत सिंह की मौत ने इस कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है कि यह समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता है।
शहर में अब गुस्सा और बेचैनी दोनों बढ़ रही हैं। सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों की मांग है कि प्रदेश सरकार तत्काल हस्तक्षेप करे। केवल सुखवंत सिंह को न्याय दिलाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि काशीपुर में वर्षों से लंबित भूमि विवाद और लेनदेन से जुड़े सभी मामलों का निष्पक्ष और समयबद्ध समाधान किया जाए।
लोगों का कहना है कि अगर अब भी सिस्टम नहीं जागा, तो हर अगली मौत प्रशासन की चुप्पी पर एक और करारा सवाल बनकर खड़ी होगी। मांग साफ है—ताकि कोई और व्यक्ति सुखवंत की तरह सिस्टम की बेरुखी का शिकार होकर अपनी जिंदगी खत्म करने को मजबूर न हो।


