
राजू अनेजा,लालकुआं। उत्तराखंड में ट्रैक्टर-ट्रॉली, पावर टिलर और जेसीबी मशीनों की फिटनेस प्रक्रिया अटकने से किसानों, वाहन स्वामियों और श्रमिकों की मुश्किलें दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि इन वाहनों पर निर्भर हजारों परिवारों की आजीविका पर संकट गहराता जा रहा है।
गौला, नंधौर, कोसी समेत प्रदेश की नदियों में उपखनिज ढुलान का जिम्मा संभालने वाली हजारों ट्रैक्टर-ट्रॉली फिलहाल खड़ी हैं। यही नहीं, गन्ना, लकड़ी, कृषि उपज और निर्माण सामग्री की ढुलाई भी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। उधर, सड़क निर्माण, खनन और भवन निर्माण कार्यों की रीढ़ मानी जाने वाली जेसीबी मशीनों के पहिए भी फिटनेस के अभाव में थमे पड़े हैं।
तकनीकी उलझन में फंसी फिटनेस प्रक्रिया
बताया जा रहा है कि एनआइसी (नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर) ने ए और सी श्रेणी में दर्ज वाहनों की सूची उत्तराखंड परिवहन विभाग को भेजते हुए यह स्पष्ट करने को कहा था कि इनके अलावा राज्य में किन वाहनों की फिटनेस की जाती है। लेकिन सरकार की ओर से समय पर जवाब न भेजे जाने के कारण ट्रैक्टर-ट्रॉली, पावर टिलर और बुलडोजर (जेसीबी) की फिटनेस का विकल्प परिवहन विभाग की कंप्यूटर प्रणाली में सक्रिय ही नहीं हो सका।
नतीजतन आरटीओ और एटीएस केंद्र इन वाहनों की फिटनेस जारी करने में असमर्थ हैं। इसका सीधा असर ग्रामीण और कस्बाई इलाकों की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ रहा है।
मंत्रालय से लेकर जिलाधिकारी तक पहुंची आवाज
इस गंभीर समस्या को लेकर हल्दूचौड़ जग्गी निवासी किशोर पंत ने भारत सरकार के परिवहन मंत्रालय को पत्र भेजकर हालात से अवगत कराया और शीघ्र समाधान की मांग की। वहीं गत सप्ताह समाजसेवी हेमवती नंदन दुर्गापाल और बसंत जोशी ने जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल से मुलाकात कर समस्या उनके सामने रखी।
जिलाधिकारी के निर्देश पर परिवहन विभाग हरकत में आया। इसके बाद परिवहन विभाग देहरादून के डिप्टी कमिश्नर सुनील शर्मा ने सचिव परिवहन को पत्र भेजकर परिवहन पोर्टल में ट्रैक्टर-ट्रॉली, पावर टिलर और जेसीबी की फिटनेस का विकल्प तत्काल उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।
अब देखना यह है कि प्रशासनिक स्तर पर यह अड़चन कब दूर होती है, क्योंकि तब तक किसानों, वाहन स्वामियों और मजदूरों की आजीविका पर मंडराता संकट और गहराने की आशंका बनी हुई है।
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