सीजन आते ही काशीपुर के बाजार में छिड़ी ‘कारोबारी जंग’, सड़क किनारे सजती दुकानों से परेशान व्यापारी!

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दुकानदार भर रहे स्टॉक, फुटपाथ और सड़कों पर लग रहे टेंट; व्यापारियों ने प्रशासन से उठाई कार्रवाई की मांग

जीएसटी, कर्मचारियों की तनख्वाह और बिजली बिल भरने वाले कारोबारियों का सवाल—सड़क पर दुकान सजाकर बेचने वालों के लिए नियम अलग क्यों?

राजू अनेजा, काशीपुर।सीजन नजदीक आते ही काशीपुर के बाजारों में कारोबार की सरगर्मियां तेज हो गई हैं। दुकानदार अपनी-अपनी दुकानों में भरपूर स्टॉक जुटाने में लगे हैं, ताकि त्योहार और खरीदारी के इस दौर में ग्राहकों को बेहतर सामान उपलब्ध करा सकें। लेकिन इसी बीच शहर के व्यापारिक माहौल में एक पुराना विवाद फिर गर्माने लगा है। बाजार की सड़कों, किनारों और सार्वजनिक स्थानों पर टेंट लगाकर दुकानें सजाने तथा माल बेचने वालों के खिलाफ अब व्यापारी समाज खुलकर सामने आने लगा है। व्यापारियों का आरोप है कि एक तरफ वे जीएसटी, कर्मचारियों की तनख्वाह, बिजली बिल, किराया और अन्य खर्चों का बोझ उठाकर कारोबार कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सड़क किनारे अस्थायी दुकानें लगाने वाले कारोबारी कथित तौर पर इन खर्चों से बचते हुए बाजार में प्रतिस्पर्धा को असंतुलित कर रहे हैं।

व्यापारियों का कहना है कि यह केवल दो दुकानदारों के बीच का विवाद नहीं, बल्कि नियमों के तहत कारोबार करने वाले व्यापारियों और सार्वजनिक सड़कों पर अस्थायी दुकानें सजाकर माल बेचने की व्यवस्था से जुड़ा बड़ा सवाल है। उनका तर्क है कि जब स्थायी दुकानदारों को तमाम खर्च उठाने पड़ते हैं, तो सड़क किनारे कारोबार करने वालों के लिए भी लागू नियमों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

‘हम टैक्स भरें, वे सड़क पर दुकान सजाकर कारोबार करें!’

व्यापारी समाज का कहना है कि एक स्थायी दुकान चलाना आसान नहीं है। दुकान का किराया, बिजली का बिल, कर्मचारियों की तनख्वाह, माल की खरीद, जीएसटी और दूसरे जरूरी खर्च निकालने के बाद व्यापारी के पास जो बचता है, उसी से परिवार और कारोबार दोनों चलाने पड़ते हैं। इसके बावजूद दुकानदार बाजार में अपनी साख बनाए रखने और ग्राहकों को उचित दाम पर सामान उपलब्ध कराने की कोशिश करते हैं।

इसके उलट, व्यापारियों का आरोप है कि सीजन के दौरान बाहर से आने वाले कुछ कारोबारी सड़कों के किनारे टेंट लगाकर या खुले में माल बेचने लगते हैं। कई जगह बाजार की दुकानों की तुलना में काफी कम कीमत पर सामान बेचे जाने की बात भी सामने आती है। ऐसे में स्थायी दुकानदारों के सामने ग्राहकों को बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो जाती है।

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व्यापारियों का सवाल है कि यदि कोई कारोबारी नियमित रूप से व्यापार कर रहा है, तो उसके पंजीकरण, जीएसटी संबंधी दायित्वों और अन्य लागू नियमों की जांच क्यों न की जाए? हालांकि, केवल सड़क किनारे दुकान लगाने या कम कीमत पर माल बेचने से किसी को कर चोरी का दोषी नहीं माना जा सकता। व्यापारियों की मांग है कि संबंधित विभाग दस्तावेजों की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें।

बाजपुर रोड पर लकड़ी की अलमारी और मंदिर बेचने वाले के खिलाफ उठी आवाज

शहर के बाजपुर रोड पर लकड़ी की अलमारियां और मंदिर रखकर सड़क किनारे कारोबार किए जाने का मामला भी व्यापारियों के विरोध का कारण बना है। व्यापारियों ने इस तरह सड़क पर दुकान सजाकर माल बेचने की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की है।

उनका कहना है कि सड़क और उसके आसपास के सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह दुकानें सजने से यातायात प्रभावित होने, आवागमन में परेशानी पैदा होने और बाजार की व्यवस्था बिगड़ने की आशंका रहती है। यदि किसी स्थान पर अतिक्रमण या यातायात बाधित होने की स्थिति है, तो संबंधित विभाग को मौके पर पहुंचकर जांच करनी चाहिए और नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए।

व्यापारी समाज चाहता है कि प्रशासन यह स्पष्ट करे कि सार्वजनिक सड़क के किनारे इस तरह कारोबार करने की अनुमति किन शर्तों पर दी जा सकती है। यदि किसी दुकानदार ने नियमों के तहत अनुमति ली है, तो उसकी भी जांच हो और यदि बिना अनुमति सड़क बाधित की जा रही है, तो कार्रवाई में देरी क्यों?

रेलवे स्टेशन के माल गोदाम के सामने हर साल सजते हैं गर्म कपड़ों के स्टॉल, अनुमति कौन देता है?

काशीपुर रेलवे स्टेशन के माल गोदाम के सामने हर साल गर्म कपड़ों के स्टॉल लगने का मुद्दा भी व्यापारियों के सवालों में शामिल है। सीजन आते ही यहां अस्थायी दुकानें सजने और गर्म कपड़ों की बिक्री शुरू होने की बात कही जाती है। ऐसे में व्यापारियों ने सवाल उठाया है कि इन स्टॉलों को लगाने की अनुमति कौन देता है, किस विभाग के पास इसकी जिम्मेदारी है और क्या संबंधित कारोबारी सभी जरूरी नियमों का पालन करते हैं?

व्यापारियों का कहना है कि यदि किसी सार्वजनिक या रेलवे से संबंधित भूमि पर अस्थायी स्टॉल लगाए जाते हैं, तो उनकी अनुमति, निर्धारित स्थान, शुल्क और अन्य शर्तों की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। रेलवे की जमीन होने की स्थिति में संबंधित रेलवे प्राधिकरण तथा स्थानीय प्रशासन को अपने-अपने अधिकार क्षेत्र के अनुसार स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

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हर साल स्टॉल लगते हैं, कारोबार होता है, लेकिन अनुमति और जवाबदेही को लेकर सवाल क्यों बने रहते हैं? व्यापारियों की मांग है कि इस मामले में संबंधित विभाग जांच कर स्पष्ट करे कि स्टॉल नियमानुसार लगाए जा रहे हैं या नहीं।

आधे दाम पर कपड़े बेचने वालों के टैक्स और पंजीकरण की भी हो जांच

बाजार में स्थायी दुकानों की तुलना में कम कीमत पर गर्म कपड़े बेचने वाले अस्थायी स्टॉल भी चर्चा के केंद्र में हैं। व्यापारियों का सवाल है कि यदि कहीं बाजार के मुकाबले आधे दाम पर कपड़े बेचे जा रहे हैं, तो संबंधित कारोबारियों के माल की खरीद, बिल, पंजीकरण और लागू कर नियमों की जांच की जानी चाहिए।

हालांकि, कम कीमत पर सामान बेचना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। थोक खरीद, पुराने स्टॉक, अलग गुणवत्ता और कम परिचालन खर्च के कारण भी कीमतों में अंतर हो सकता है। लेकिन यदि किसी कारोबारी पर नियमों का पालन नहीं करने या कर संबंधी अनियमितता का संदेह है, तो उसका समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि संबंधित विभाग की निष्पक्ष जांच से ही निकल सकता है।

व्यापारियों की मांग है कि जीएसटी विभाग संदिग्ध कारोबार की जांच करे, नगर निगम सार्वजनिक स्थानों पर दुकान लगाने की अनुमति और अतिक्रमण की स्थिति देखे तथा यातायात पुलिस सड़क बाधित होने पर आवश्यक कार्रवाई करे। इससे न केवल स्थायी व्यापारियों को राहत मिल सकती है, बल्कि बाजार में कारोबार के लिए एक समान नियम लागू करने की दिशा में भी कदम उठाया जा सकता है।

‘हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा’—व्यापारियों का तंज

सड़क किनारे दुकानें सजाकर कारोबार करने की व्यवस्था पर नाराज व्यापारियों का तंज है—‘हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा।’ उनका कहना है कि स्थायी दुकानदार अपनी दुकान चलाने के लिए हर महीने तमाम खर्च उठाते हैं। कर्मचारी रखने पड़ते हैं, बिजली का बिल देना पड़ता है, माल खरीदने के लिए पूंजी लगानी पड़ती है और कारोबार से जुड़े कर संबंधी नियमों का पालन करना पड़ता है।

व्यापारियों के मुताबिक, जब सीजन में अस्थायी दुकानें सज जाती हैं, तो कम कीमत का आकर्षण ग्राहकों को अपनी ओर खींचता है। इससे स्थायी दुकानदारों की बिक्री पर असर पड़ने की आशंका रहती है। ऐसे में व्यापारियों को लगता है कि उनके सामने प्रतिस्पर्धा तो है, लेकिन कारोबार की परिस्थितियां समान नहीं हैं।

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उनका कहना है कि वे सड़क किनारे कारोबार करने वाले हर व्यक्ति के विरोध में नहीं हैं। उनकी मांग है कि व्यापार करने का अधिकार सबको मिले, लेकिन नियम भी सब पर समान रूप से लागू हों। यदि किसी को अस्थायी स्टॉल लगाने की अनुमति दी जाती है, तो वह निर्धारित स्थान और शर्तों के अनुसार हो। यदि किसी पर कर चोरी या अन्य अनियमितता का संदेह है, तो जांच के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

प्रशासन से व्यापारियों की दो टूक—सड़क भी बचाइए, बाजार भी

व्यापारी समाज ने प्रशासन से मांग की है कि काशीपुर के प्रमुख बाजारों, बाजपुर रोड और रेलवे स्टेशन के माल गोदाम के सामने लगने वाले अस्थायी स्टॉलों की स्थिति का संज्ञान लिया जाए। सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण, यातायात में बाधा, आवश्यक अनुमति और कर संबंधी नियमों की जांच के लिए संबंधित विभाग संयुक्त रूप से कार्रवाई करें।

व्यापारियों का कहना है कि बाजार केवल दुकानों की कतार नहीं, बल्कि शहर की आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां स्थायी कारोबार करने वाले लोग वर्षों से अपनी पूंजी लगाकर व्यापार चला रहे हैं और स्थानीय स्तर पर रोजगार भी उपलब्ध करा रहे हैं। ऐसे में प्रशासन की जिम्मेदारी है कि किसी भी कारोबारी के साथ अन्याय न हो और सार्वजनिक सड़कों का उपयोग भी नियमों के अनुरूप हो।

अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन व्यापारियों की इस मांग पर क्या कदम उठाता है। क्या संबंधित विभाग अस्थायी स्टॉलों की अनुमति, पंजीकरण और सड़क पर अतिक्रमण की स्थिति की जांच करेंगे, या फिर हर सीजन में उठने वाला यह सवाल अगले सीजन तक यूं ही बना रहेगा?

फिलहाल काशीपुर के व्यापारियों का सवाल साफ है—जब कारोबार के नियम सबके लिए हैं, तो उनकी जांच और पालन भी सबके लिए एक समान क्यों नहीं?