
राजू अनेजा, काशीपुर।हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में उपभोक्ता सेवाओं और क्लेम निपटान को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच अब जिम्मेदारी का दायरा और सख्त होने के संकेत मिल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बीमा कंपनियां ही नहीं, बल्कि पॉलिसी बेचने वाले एजेंट भी अब कानूनी जांच और जवाबदेही के दायरे में आ सकते हैं।
भरोसे का कारोबार, लेकिन भरोसे पर सवाल
हेल्थ इंश्योरेंस को आमतौर पर “भरोसे का कारोबार” माना जाता है, क्योंकि यह संकट की घड़ी में परिवार को आर्थिक सुरक्षा देता है। लेकिन कई मामलों में मरीज या उनके परिजनों को क्लेम, कैशलेस सुविधा और हेल्पलाइन सपोर्ट को लेकर परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
बीमारी के वक्त आर्थिक ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी टूटता है परिवार
बीमारी और इमरजेंसी का समय किसी भी परिवार के लिए सबसे कठिन दौर माना जाता है। एक तरफ मरीज की बिगड़ती हालत, दूसरी तरफ अस्पतालों के भारी-भरकम बिल, ऊपर से मानसिक तनाव और शारीरिक पीड़ा… ऐसे समय में लोग जिस हेल्थ इंश्योरेंस पर भरोसा करते हैं, वही यदि संकट की घड़ी में साथ छोड़ दे तो हालात और भी भयावह हो जाते हैं।
आजकल लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां पॉलिसी बेचते समय तो बड़े-बड़े दावे करने वाले एजेंट और कंपनियां क्लेम के वक्त अक्सर हाथ खड़े करती नजर आती हैं।
पॉलिसी बेचते समय बड़े-बड़े वादे, क्लेम के वक्त फोन न उठाने वालों पर उठ रहे सवाल
कई पीड़ित परिवारों का आरोप है कि पॉलिसी बेचते समय “कैशलेस इलाज”, “24 घंटे सहायता” और “फुल सपोर्ट” जैसे बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जैसे ही अस्पताल में भर्ती होने या क्लेम की नौबत आती है, वही एजेंट फोन उठाना तक बंद कर देते हैं।
कई लोगों ने आरोप लगाया कि मदद मांगने पर उन्हें सही जानकारी देने के बजाय टालमटोल, अभद्र व्यवहार और जिम्मेदारी से बचने की कोशिश का सामना करना पड़ता है।
मानसिक उत्पीड़न से लेकर आर्थिक नुकसान तक
वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कुमार आकाश का कहना है कि इमरजेंसी के समय सर्विस न मिलना केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि मरीज और परिवार के लिए मानसिक उत्पीड़न का कारण बन सकता है।
उन्होंने कहा कि समय पर सहायता न मिलने से इलाज में देरी, अस्पताल बदलने की मजबूरी और लाखों रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ परिवार पर पड़ सकता है। कई बार ऐसी स्थिति मरीज की शारीरिक हालत को भी और गंभीर बना देती है।
अब एजेंटों पर भी कसेगा कानूनी शिकंजा
वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कुमार आकाश के मुताबिक यदि कोई एजेंट ग्राहक को गुमराह कर पॉलिसी बेचता है, संकट के समय जिम्मेदारी से बचता है या अभद्र व्यवहार करता है, तो मामला केवल शिकायत तक सीमित नहीं रहता।
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में उपभोक्ता आयोग, बीमा नियामक संस्था Insurance Regulatory and Development Authority of India और पुलिस तक कार्रवाई भी पहुंच सकती है।
लाइसेंस रद्द से लेकर एफआईआर तक की नौबत
वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना है कि यदि जांच में एजेंट की गंभीर लापरवाही, गलत जानकारी, जानबूझकर सहायता न देने या ग्राहकों को गुमराह करने जैसी बातें सामने आती हैं, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई संभव है।
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में एजेंट का लाइसेंस रद्द होना, भारी आर्थिक दंड, ब्लैकलिस्टिंग और गंभीर परिस्थितियों में एफआईआर तक दर्ज हो सकती है।
अभद्र व्यवहार करने वाले एजेंटों को कानूनी शिकंजा
संजीव कुमार आकाश ने साफ कहा कि मरीज की जिंदगी से जुड़े मामलों में अभद्र व्यवहार और लापरवाही को हल्के में नहीं लिया जाता।
उन्होंने कहा कि संकट की घड़ी में सहायता मांग रहे परिवारों के साथ दुर्व्यवहार करने वाले एजेंट पर कानूनी जांच और सख्त कार्रवाई भी हो सकती हैं।
लोग बोले — हेल्थ इंश्योरेंस भरोसा है, कारोबार नहीं
आम लोगों का कहना है कि हेल्थ इंश्योरेंस केवल प्रीमियम वसूलने का माध्यम नहीं, बल्कि संकट के समय भरोसे और जिम्मेदारी का विषय है।
यदि जरूरत पड़ने पर एजेंट और कंपनियां मुंह मोड़ लें, तो लोगों का भरोसा पूरी व्यवस्था से उठ सकता है। यही वजह है कि अब ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की मांग लगातार तेज होती जा रही है।
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