कुछ तो करो साहब !अब शिक्षा के क्षेत्र में फिसड्डी हो रहा आपका काशीपुर, 70% स्कूलों में प्रिंसिपल ही नहीं, ‘प्रभारी सिस्टम’ के भरोसे बच्चों का भविष्य”

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राजू अनेजा, काशीपुर।सड़क, स्वास्थ्य, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं में पिछड़ते काशीपुर की तस्वीर अब शिक्षा के मोर्चे पर भी चिंताजनक हो चुकी है। विकास के दावों के बीच जमीनी हकीकत यह है कि काशीपुर का शिक्षा सिस्टम खुद ही बैसाखियों के सहारे खड़ा नजर आ रहा है।
ताजा आंकड़े चौंकाने वाले हैं—काशीपुर ब्लॉक के करीब 70 प्रतिशत सरकारी विद्यालय आज भी बिना स्थायी प्रधानाचार्य के संचालित हो रहे हैं। यानी स्कूलों की कमान प्रभारी शिक्षकों के हाथ में है, जो खुद पहले से ही शैक्षणिक और प्रशासनिक दबाव में हैं।

आंकड़ों में समझिए हाल:

कुल 13 राजकीय इंटर कॉलेज व माध्यमिक विद्यालय
9 स्कूलों में आज तक स्थायी प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक नहीं
सिर्फ 4 स्कूलों में नियमित प्रधानाचार्य तैनात
70% स्कूल ‘प्रभारी सिस्टम’ पर निर्भर

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कौन संभाल रहा सिस्टम?

राजकीय इंटर कॉलेज बांसखेड़ा, प्रतापपुर, जोशी मझरा और जीजीआईसी काशीपुर जैसे कुछ विद्यालयों में ही स्थायी प्रधानाचार्य कार्यरत हैं।
जबकि बरखेड़ी, महुआखेड़ा गंज, ढकिया, मानपुर, गुलजारपुर, बरखेड़ा पांडे, शिवलालपुर अमरझंडा और दभौरा मुस्तकम समेत कई स्कूल प्रभारी शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं।

 

रिजल्ट ने खोली पोल:

 

इस अव्यवस्था का असर अब सीधे बोर्ड परीक्षाओं में दिखाई दे रहा है। जीजीआईसी काशीपुर को छोड़ दें तो बाकी स्कूलों का एक भी छात्र मेरिट सूची तक नहीं पहुंच पाया। इंटर और हाईस्कूल के परिणाम लगातार गिरते जा रहे हैं।

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दोहरी मार झेल रहे शिक्षक:

प्रभारी बनाए गए शिक्षक एक साथ प्रशासन और पढ़ाई दोनों संभाल रहे हैं।
कई बार विभागीय कार्यों और बैठकों में उलझने के कारण कक्षाएं भी प्रभावित होती हैं, जिसका सीधा नुकसान छात्रों को उठाना पड़ रहा है।

जिम्मेदारों का रटा-रटाया जवाब:

 

अधिकारियों के मुताबिक प्रधानाचार्यों के पद प्रदेशभर में खाली हैं और पदोन्नति के जरिए भरे जाने हैं। मामला कोर्ट में लंबित होने का हवाला देकर हर बार प्रक्रिया का इंतजार करने की बात कही जाती है।

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सबसे बड़ा सवाल:

जब स्कूलों में ही स्थायी नेतृत्व नहीं होगा, तो गुणवत्ता, अनुशासन और बेहतर परिणामों की उम्मीद आखिर कैसे की जाए?
काशीपुर में शिक्षा व्यवस्था आज पूरी तरह “प्रभारी सिस्टम” पर टिकी हुई है।
और हकीकत यही है—जब स्कूलों में मुखिया ही नहीं, तो शिक्षा का स्तर गिरना तय है।