
राजू अनेजा,रुद्रपुर।कभी जिस बेटे ने अपनी किडनी देकर पिता को मौत के मुंह से खींच लाया था, आज उसी बेटे ने अपने कर्मों से पिता को समाज के बीच शर्म, पीड़ा और अपमान के कठघरे में खड़ा कर दिया। यह कहानी राजनीति की नहीं, बल्कि एक पिता के भीतर टूटते विश्वास और चूर-चूर होते आत्मसम्मान की है।
तराई का शेर कहे जाने वाले विधायक तिलक राज बेहड़ आज पत्रकार वार्ता में जिस हालत में दिखाई दिए, वह दृश्य सत्ता के गलियारों से कहीं आगे का था। वर्षों तक आंदोलन, संघर्ष और जननेतृत्व का भार उठाने वाले मजबूत कंधे आज झुके हुए थे। आंखों में आक्रोश नहीं, असहाय पीड़ा थी। आवाज में गुस्सा नहीं, टूटन थी। यह कोई रणनीतिक बयान नहीं था, बल्कि एक ऐसे पिता की स्वीकारोक्ति थी, जिसकी दुनिया उसके ही बेटे ने हिला दी।
जिस पुत्र को उन्होंने संस्कार दिए, जिस पर भविष्य की उम्मीदें टिकी थीं, वही पुत्र जब छल, साजिश और झूठ की राह पर चला, तो यह चोट राजनीतिक नहीं, सीधे दिल पर लगी। सत्ता, पद और प्रभाव सब बेमानी हो गए। मंच पर खड़ा व्यक्ति विधायक नहीं था, बल्कि एक ऐसा पिता था, जिसे अपने ही खून से मिले धोखे ने अंदर से तोड़ दिया था।
सबसे बड़ा और कड़ा संदेश उसी क्षण सामने आया, जब बेहड़ ने रिश्तों को ढाल नहीं बनाया। उन्होंने कानून से ऊपर पिता होने का दावा नहीं किया। उलटे, उन्होंने समाज और व्यवस्था के सामने खड़े होकर कहा कि अगर बेटा दोषी है, तो उसे किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाना चाहिए। यह शब्द राजनीति की मजबूरी नहीं, बल्कि नैतिक साहस की मिसाल थे।
तराई का शेर उस दिन गरजा नहीं।
वह चुपचाप जल रहा था।
अपने घर की आग में।
उसके आंसू यह बता गए कि सार्वजनिक जीवन में कठोर दिखने वाला व्यक्ति भीतर से कितना संवेदनशील हो सकता है। यह भी साबित हो गया कि सच्ची ताकत सत्ता में नहीं, बल्कि गलत के खिलाफ खड़े होने के साहस में होती है—भले ही वह गलत अपना ही क्यों न हो।
लेकिन यह सच्चाई भी उतनी ही कड़वी है कि जिस बेटे ने कभी पिता को नई जिंदगी दी, उसी बेटे के कारण पिता को आज समाज के सामने इस तरह टूटते देखना पड़ा। यह दृश्य केवल एक नेता की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है—कि जब संस्कार टूटते हैं, तो उनका मलबा सबसे पहले अपनों पर ही गिरता है।
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