पशुधन विकास में देश का मॉडल बनेगा उत्तराखंड: एम्ब्रियो ट्रांसफर टेक्नोलॉजी लागू करने वाला पहला राज्य; ₹18,500 के खर्च पर मिलेगी भारी सब्सिडी

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देहरादून, 20 जून 2026: उत्तराखंड के पशुपालकों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए धामी सरकार देश का पहला अभिनव प्रयोग करने जा रही है। राज्य का पशुपालन विभाग एक ऐसी आधुनिक तकनीक पर काम कर रहा है, जिससे पशुओं की नस्ल में क्रांतिकारी सुधार होगा। इस तकनीक को धरातल पर उतारने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बनने जा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट इस महत्वाकांक्षी योजना को अपनी विधिक व प्रशासनिक मंजूरी दे चुकी है।

पारंपरिक कृत्रिम गर्भाधान की जगह ‘एम्ब्रियो ट्रांसफर टेक्नोलॉजी’ का होगा इस्तेमाल

पशुपालन विभाग के अनुसार, अब तक पशुओं की नस्ल सुधार के लिए जिस पारंपरिक कृत्रिम गर्भाधान प्रणाली (Artificial Insemination) का उपयोग किया जाता रहा है, उसकी तुलना में नई एम्ब्रियो ट्रांसफर टेक्नोलॉजी (भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक) कहीं अधिक प्रभावी साबित होगी।

  • पहली पीढ़ी से ही दिखेगा सुधार: पारंपरिक व्यवस्था में बेहतर जेनेटिक गुण आने में तीन से चार पीढ़ियां लग जाती हैं, जबकि इस आधुनिक तकनीक के जरिए पहली पीढ़ी से ही उच्च जेनेटिक गुणों का विकास देखने को मिलेगा।

  • वैज्ञानिक पद्धति: इसमें उच्च गुणवत्ता वाले दुधारू पशुओं के भ्रूण को प्रयोगशाला में वैज्ञानिक तरीके से विकसित कर दूसरे सामान्य पशुओं में प्रत्यारोपित किया जाएगा। इससे पैदा होने वाले बछड़े और बछियां उच्च उत्पादकता वाले होंगे।

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प्रथम चरण में तीन जिलों में पायलट प्रोजेक्ट; कालसी सेंटर में तैयार हुई स्वदेशी तकनीक

इस पूरी परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके लिए किसी विदेशी तकनीक या बाहरी विशेषज्ञों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। इसे उत्तराखंड ने अपने स्तर पर पूरी तरह स्वदेशी रूप से विकसित किया है:

  • कालसी में हुआ सफल परीक्षण: देहरादून जिले के कालसी स्थित ‘पशुधन उत्कृष्टता केंद्र’ (Center of Excellence) में इस तकनीक को लेकर किए गए शुरुआती विधिक व वैज्ञानिक प्रयोग पूरी तरह उत्साहजनक और सफल रहे हैं।

  • तीन जिलों से शुरुआत: योजना के तहत सबसे पहले देहरादून, हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जिलों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जाएगा। इन जिलों का चयन यहाँ पशुपालन गतिविधियों की अधिकता और बेहतर आधारभूत बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता के आधार पर किया गया है। इसके बाद इसे चरणबद्ध तरीके से पूरे राज्य में लागू किया जाएगा।

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5 वर्षों में ₹30 करोड़ की अतिरिक्त आय और 7,000 मीट्रिक टन दूध उत्पादन का अनुमान

पशुपालन विभाग ने इस योजना के दूरगामी आर्थिक लाभों का खाका तैयार किया है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है:

  • दूध उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि: विभाग का अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में इस तकनीक के माध्यम से प्रदेश में लगभग 7,000 मीट्रिक टन अतिरिक्त दूध का उत्पादन संभव हो सकेगा।

  • आय में बढ़ोतरी: इससे राज्य के पशुपालकों की आय में करीब ₹30 करोड़ तक की सीधी वृद्धि होने की प्रबल संभावना है। उच्च गुणवत्ता वाली बछियां आगे चलकर रिकॉर्ड दूध देंगी, जिससे बाजार में उनकी विधिक कीमत भी सामान्य पशुओं की तुलना में कई गुना अधिक होगी।

₹18,500 के खर्च पर सरकार देगी भारी सब्सिडी; पशुपालकों को देने होंगे मात्र ₹1,500

इस तकनीक की वास्तविक लागत काफी अधिक है। विभागीय वैज्ञानिक आकलन के अनुसार, एक पशु में विकसित भ्रूण प्रत्यारोपित करने का कुल खर्च लगभग ₹18,500 आता है। लेकिन सरकार गरीब व मध्यम वर्गीय पशुपालकों पर इसका आर्थिक बोझ नहीं डालना चाहती।

“प्रस्तावित विधिक व्यवस्था के तहत पशुपालकों को भारी सरकारी सब्सिडी का लाभ दिया जाएगा। उन्हें केवल ₹1,500 से ₹2,000 तक का आंशिक अंशदान (Contribution) देना होगा, जबकि बाकी का संपूर्ण भारी-भरकम खर्च राज्य सरकार स्वयं वहन करेगी।”

सौरभ बहुगुणा, पशुपालन मंत्री, उत्तराखंड

पशुपालन मंत्री सौरभ बहुगुणा ने इसे प्रदेश के पशुधन विकास के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि और मील का पत्थर बताया है। यदि विभाग की उम्मीदों के अनुरूप इसके परिणाम सामने आते हैं, तो आने वाले सालों में उत्तराखंड देश के पशुधन विकास मानचित्र पर एक अग्रणी और सर्वश्रेष्ठ मॉडल राज्य के रूप में स्थापित हो जाएगा।

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