रानीखेत: स्याल्दे के सराईंखेत में कालिंका माता मंदिर मेले में उमड़ा आस्था का सैलाब, सजीव हुई गढ़-कुमौं की विरासत
रानीखेत: अल्मोड़ा जनपद के स्याल्दे ब्लाक स्थित ऐतिहासिक सराईंखेत के शिखर पर बने माँ कालिंका देवी मंदिर में तीन वर्ष बाद लगे पौराणिक कौतिक (मेले) में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। ढोल-नगाड़ों की गूंज और माँ के जयघोष के बीच गढ़ और कुमाऊं की साझी धार्मिक व सांस्कृतिक विरासत एक बार फिर सजीव हो उठी।
🔱 गढ़-कुमौं की साझी आस्था
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कौतिक: यह मेला प्रत्येक तीन वर्ष बाद लगता है, जिसके कारण इस बार माँ के दरबार में तिल धरने तक की जगह नहीं थी। शाम तक कौतिक की रौनक बनी रही।
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परंपरा: प्राचीन परंपरा के अनुसार, कुमाऊं के सात और गढ़वाल के आठ सेवक गांवों के ग्रामीण माँ कालिंका का पवित्र डोला लेकर मंदिर पहुँचे। विशेष पूजा-अर्चना के साथ मेले का विधिवत श्रीगणेश हुआ।
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जनसैलाब: गढ़-कुमौं के साथ ही दिल्ली, मुंबई, पंजाब, हरियाणा जैसे विभिन्न राज्यों में बसे प्रवासी उत्तराखंडी भी शीश नवाने पहुँचे। शाम तक 30 हजार से ज्यादा श्रद्धालु माता के दर्शन को पहुँचे।
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जागर परंपरा: मेले की पूर्व संध्या पर जागर परंपरा निभाई गई। बीती देर शाम से बंदरकोट व क्वाटा गांव में देवी अवतरण की रस्म पूरी की गई।
🏞️ पेयजल और सड़क का मुद्दा
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प्रवासी योगदान: दिल्ली, मुंबई, पंजाब आदि शहरों से आए प्रवासी हर तीसरे वर्ष भंडारा और मंदिर के सुंदरीकरण कार्यों में आस्था के साथ योगदान देते हैं।
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समस्या: मंदिर समिति सदस्य मनवर सिंह के अनुसार, प्रशासनिक स्तर पर व्यवस्थाएं पूरी थीं, लेकिन पेयजल की समस्या बरकरार है। उन्होंने मंदिर तक सड़क सुधारीकरण की भी जरूरत बताई।
📜 मंदिर का ऐतिहासिक महत्व
माँ कालिंका देवी, जो बडियारी क्षत्रियों की कुलदेवी मानी जाती हैं, पौड़ी गढ़वाल की सीमा पर अल्मोड़ा जनपद के अंतिम गाँव मटखानी में स्थित हैं।
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गोरखा युद्ध: लोककथा के अनुसार, 1790 में गोरखों के आक्रमण के दौरान बडियारी क्षत्रियों के मुखिया लैली बाबा ने माँ कालिंका का स्मरण किया, जिसके बाद माँ ने साक्षात दर्शन दिए और विजयश्री प्राप्त हुई।
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निर्माण: गोरखों को परास्त करने के बाद 18वीं सदी में गढ़-कुमौं की सीमा पर यह मंदिर बनवाया गया।
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वर्तमान: वर्तमान में माँ कालिंका मंदिर को उत्तराखंड मिशन माला प्रोजेक्ट में शामिल किया गया है।

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