कैलाश यात्रा के इंतजाम ध्वस्त: क्षमता से अधिक यात्रियों के पहुंचने से चरमराई आवास व्यवस्था; कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे रात बिताने को मजबूर श्रद्धालु

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धारचूला (पिथौरागढ़): उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में स्थित आदि कैलाश और ऊं पर्वत दर्शन यात्रा के दौरान एक बेहद चिंताजनक स्थिति सामने आ रही है। मैदानी क्षेत्रों में पड़ रही भीषण और रिकॉर्डतोड़ गर्मी से राहत पाने व भगवान शिव के धाम के दर्शन के लिए उमड़ रहे श्रद्धालुओं के सैलाब के चलते स्थानीय प्रशासन और आवास व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। हालात इस कदर बेकाबू हो चुके हैं कि उच्च हिमालयी क्षेत्र की हाड़ कंपाने वाली ठंड में भी सैकड़ों यात्रियों को ठहरने के लिए कमरा या टेंट तक नसीब नहीं हो रहा है, जिसके चलते सोमवार की पूरी रात यात्रियों को खुले आसमान के नीचे ठिठुरते हुए बितानी पड़ी। पर्यटन और स्थानीय जानकारों का मानना है कि यदि इनर लाइन परमिट की संख्या को तुरंत नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह समस्या और अधिक गंभीर व जानलेवा हो सकती है।

सिर्फ 1 मई से अब तक पहुंचे 23 हजार से अधिक यात्री, हर रोज जारी हो रहे 1000 परमिट

प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, बीते 1 मई से शुरू हुई इस वर्ष की आदि कैलाश यात्रा ने अपने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। महज 26-27 दिनों के भीतर ही 23 हजार से अधिक श्रद्धालु इस दुर्गम मार्ग पर पहुंच चुके हैं।

  • परमिट और वाहनों का दबाव: स्थानीय प्रशासन द्वारा आदि कैलाश और ऊं पर्वत दर्शन यात्रा के लिए प्रतिदिन 1,000 से अधिक इनर लाइन परमिट (Inner Line Permit) धड़ाधड़ जारी किए जा रहे हैं।

  • सड़कों पर वाहनों का रेला: सीमांत क्षेत्र गुंजी के स्थानीय निवासी एम.एस. गुंज्याल ने बताया कि क्षेत्र में यात्रियों का दबाव अब सहनशक्ति से बाहर हो चुका है। हर रोज 300 से 400 छोटे-बड़े वाहन यात्रियों को लेकर गुंजी और नाभीढांग की तरफ बढ़ रहे हैं। वाहनों की भारी किल्लत के चलते कई यात्रियों को धारचूला बेस कैंप में ही तीन-चार दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है।

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क्षमता महज 600 यात्रियों की, मार्ग में पड़ाव बनाने की उठी मांग

स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, उच्च हिमालयी व्यास घाटी के इन गांवों में अभी भी बुनियादी और आधुनिक आवासीय सुविधाएं बेहद सीमित हैं। इन सुदूर इलाकों में बड़े होटलों का नामोनिशान नहीं है। कुमाऊं मंडल विकास निगम (KMVN) के गिने-चुने आवास गृहों (गेस्ट हाउस) के अलावा स्थानीय ग्रामीणों ने अपने स्तर पर ‘होम स्टे’ (Home Stay) की व्यवस्था की है।

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इन सभी होम स्टे और केएमवीएन के केबिनों को मिलाकर पूरे क्षेत्र में एक समय में केवल 500 से 600 यात्रियों को ही ठहराने की कुल क्षमता है। लेकिन जब हर रोज हजार से डेढ़ हजार लोग वहां पहुंच रहे हैं, तो अव्यवस्था होना लाजमी है। सोमवार की रात जिन यात्रियों को खुले आसमान के नीचे रात गुजारनी पड़ी, उन्हें मंगलवार सुबह तब जाकर कमरा नसीब हुआ, जब पहले से ठहरे हुए यात्री दर्शन कर वापस नीचे की ओर लौटे।

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प्रशासनिक तालमेल और सुविधाओं के विस्तार की तत्काल आवश्यकता

क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने उत्तराखंड सरकार तथा जिला प्रशासन से इस अव्यवस्था को तत्काल सुधारने की पुरजोर मांग की है। उन्होंने सुझाव दिया है कि:

  1. यात्रियों को सीधे गुंजी भेजने के बजाय मार्ग के अलग-अलग पड़ावों (जैसे पांगला, बूंदी, गर्ब्यांग) पर चरणबद्ध तरीके से रोकने की पुख्ता व्यवस्था की जाए।

  2. इनर लाइन परमिट की दैनिक संख्या को क्षेत्र की धारण क्षमता (Carrying Capacity) के अनुसार सीमित किया जाए।

  3. उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आपातकालीन टेंट कॉलोनियों और अतिरिक्त आवासीय सुविधाओं का युद्धस्तर पर विस्तार किया जाए ताकि देवभूमि आने वाले शिवभक्तों को किसी अप्रिय स्थिति या ठंड जनित बीमारियों का सामना न करना पड़े।