दो-दो कप्तानों का पहरा भी नहीं बचा सका गढ़ीनेगी का किला, अब 2027 को लेकर उठे सवाल

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भाजपा के लिए मंथन का विषय

राजू अनेजा, काशीपुर। गढ़ीनेगी नगर पंचायत के पहले अध्यक्ष पद के चुनाव परिणाम ने भाजपा संगठन के सामने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस सीट को भाजपा अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देख रही थी, वहां पार्टी प्रत्याशी सचिन बाठला को हार का सामना करना पड़ा। खास बात यह रही कि चुनाव में वर्तमान जिलाध्यक्ष मनोज पाल और पूर्व जिलाध्यक्ष गुंजन सुखीजा दोनों पूरी सक्रियता के साथ मैदान में थे, लेकिन इसके बावजूद भाजपा जीत का परचम नहीं फहरा सकी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गढ़ीनेगी का चुनाव केवल एक नगर पंचायत का चुनाव नहीं था, बल्कि इसे 2027 विधानसभा चुनाव से पहले संगठन की ताकत और जमीनी पकड़ की परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा था। ऐसे में परिणाम ने भाजपा की रणनीति और संगठनात्मक क्षमता पर चर्चा तेज कर दी है।

अपने क्षेत्र की प्रतिष्ठित सीट भी नहीं बचा पाए जिलाध्यक्ष

मार्च 2025 में भाजपा हाईकमान ने युवा चेहरे के रूप में मनोज पाल को काशीपुर जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी थी। उनके सामने पंचायत चुनाव, सहकारिता चुनाव और 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों को मजबूत करने की चुनौती थी। लेकिन चुनावी नतीजों पर नजर डालें तो संगठन को लगातार झटके लगे हैं।
गढ़ीनेगी नगर पंचायत की सीट को भी भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था। संगठन ने पूरी ताकत झोंकी, कई वरिष्ठ नेताओं ने प्रचार किया, लेकिन नतीजा पार्टी के पक्ष में नहीं आया।

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हार की हैट्रिक ! पंचायत से सहकारिता और अब नगर पंचायत में भी झटका

सबसे पहले पंचायत चुनाव में क्षेत्र की पांच जिला पंचायत सदस्य सीटों में से तीन पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद बहुउद्देश्यीय किसान सेवा सहकारी समिति चुनाव में भाजपा समर्थित प्रत्याशी भागेश देवी पराजित हो गईं।
क्रय-विक्रय सहकारी समिति चुनाव में भी पार्टी को झटका लगा और भरतपुर-मेघावाला मंडल अध्यक्ष राजकुमार गुंबर चुनाव हार गए। अब गढ़ीनेगी नगर पंचायत के पहले अध्यक्ष पद का चुनाव भी भाजपा के हाथ से निकल गया। लगातार मिल रही इन हारों ने संगठन की चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
निर्दलीय अभिषेक सुखीजा ने बदले समीकरण
गढ़ीनेगी चुनाव में भाजपा प्रत्याशी सचिन बाठला और निर्दलीय प्रत्याशी अभिषेक सुखीजा के बीच कड़ा मुकाबला माना जा रहा था। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने संगठनात्मक ताकत पर भरोसा किया, जबकि अभिषेक सुखीजा ने स्थानीय जनसंपर्क और व्यक्तिगत पहुंच के दम पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई।
मतगणना के बाद आए परिणामों ने साफ कर दिया कि मतदाताओं ने निर्दलीय प्रत्याशी अभिषेक सुखीजा पर भरोसा जताया। इस जीत ने स्थानीय राजनीति के समीकरणों को भी बदल दिया है।

घोषणाएं भी नहीं दिला सकीं जीत

चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा नेताओं ने क्षेत्र के विकास को लेकर कई घोषणाएं की थीं। जिलाध्यक्ष मनोज पाल ने कहा था कि यदि सचिन बाठला नगर पंचायत के पहले चेयरमैन बनते हैं तो महाराजा दक्ष प्रजापति के नाम पर भव्य द्वार और समाज के लिए सभा भवन का निर्माण कराया जाएगा।
हालांकि मतदाताओं ने चुनाव में अलग फैसला सुनाया और भाजपा इन वादों का राजनीतिक लाभ नहीं उठा सकी।

2027 से पहले बढ़ी संगठन की चिंता

गढ़ीनेगी की हार को भाजपा के भीतर केवल एक स्थानीय निकाय चुनाव की हार के रूप में नहीं देखा जा रहा है। पंचायत चुनाव, सहकारिता चुनाव और अब नगर पंचायत चुनाव में मिले झटकों ने संगठन के सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पार्टी समय रहते स्थानीय स्तर पर संगठन को और मजबूत नहीं करती तथा कार्यकर्ताओं और समर्थकों को एकजुट रखने की रणनीति पर काम नहीं करती, तो 2027 का विधानसभा चुनाव और चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

गढ़ीनेगी का परिणाम छोड़ गया बड़ा सवाल

फिलहाल गढ़ीनेगी का परिणाम एक बड़ा सवाल छोड़ गया है— जब दो-दो कप्तानों का पहरा था, तब भी भाजपा गढ़ीनेगी का किला क्यों नहीं बचा सकी? यही सवाल अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

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